जैसे किसी दूसरे प्रदेश में वही आकाश फिर से उग आया हो—पर इस बार उसमें तुम्हारा नाम नहीं लिखा। तुम उसे पहचानते हो, फिर भी वह तुम्हें नहीं पहचानता। यह वही विस्तार है, जहाँ कभी तुम्हारी आवाज़ गूँजी थी, पर अब वहाँ केवल हवा की एक निरपेक्ष चाल बची है—जिसमें न तुम्हारा होना दर्ज है, न तुम्हारा न होना।
तुमने सोचा था कि जो बीत गया, वह समाप्त हो जाएगा। पर जो बीतता है, वह किसी और रूप में टिक जाता है—आदतों की महीन परतों में, दृष्टि के झुकाव में, उस ठहराव में जो तुम अनजाने ही हर वाक्य के अंत में जोड़ देते हो। तुम जहाँ भी जाते हो, वह बीत चुका समय तुम्हारे साथ चलता है—जैसे छाया, जो प्रकाश बदलने पर भी तुम्हें नहीं छोड़ती।
अब तुम एक नए भूगोल में खड़े हो। यहाँ रास्ते सीधे नहीं जाते—वे तुम्हें घुमाकर उसी बिंदु के आसपास ले आते हैं, जहाँ तुम पहले ही खड़े थे। फर्क इतना है कि अब तुम उसे पहचानते नहीं। तुम्हें लगता है, तुम आगे बढ़े हो; जबकि तुम केवल अपने ही वृत्त की परिधि पर चलते रहे हो।
तुम्हारे भीतर जो शेष है, वह कोई ठोस अस्तित्व नहीं—वह एक प्रक्रिया है, जो लगातार तुम्हें बदलती रहती है। तुम हर दिन थोड़ा-थोड़ा घटते हो, और उतना ही किसी और रूप में बढ़ते भी हो। पर यह बढ़ना किसी उपलब्धि की तरह नहीं आता; यह केवल एक और प्रकार का क्षय है, जो अपना ही आकार बना लेता है।
तुम सोचते हो—क्या यह संभव है कि जीवन को बिना किसी निष्कर्ष के स्वीकार किया जाए? बिना यह तय किए कि क्या सही था, क्या गलत। बिना यह माँगे कि जो खो गया, वह कभी लौट आए।
और इसी सोच के बीच तुम्हें एक क्षीण-सा बोध होता है—कि शायद जुड़ाव का अर्थ पकड़कर रखना नहीं था, बल्कि उस अदृश्य धागे को महसूस करना था, जो अलग-अलग हिस्सों को बिना शोर के बाँधे रखता है।
तुम अब भी उसी कथा में हो—बस उसका कोण बदल गया है।
पहले तुम उसके भीतर डूबे थे, अब तुम उसे दूर से देखते हो।
और यह दूरी ही
तुम्हारा नया संबंध है—
एक ऐसा संबंध,
जो टूटकर भी बना रहता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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