जैसे स्मृति के भीतर कोई गुप्त गलियारा है

 जैसे स्मृति के भीतर कोई गुप्त गलियारा है—जहाँ समय अपने ही पदचिह्नों को मिटाता चलता है। और हर मोड़ पर एक दरवाज़ा है, जो खुलते ही तुम्हें किसी ऐसे क्षण में ले जाता है जिसे तुमने जिया तो था, पर समझा कभी नहीं। अब जब तुम लौटकर देखना चाहते हो, तो पाते हो कि वे दृश्य किसी और के हैं—जैसे तुम्हारी ही ज़िंदगी का अधिकार तुमसे छिन गया हो।

तुम्हें लगता है कि तुमने निर्णय लिए थे, लेकिन धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता है कि निर्णय तुम्हें चुनते रहे। तुम एक कथा के पात्र हो, लेखक नहीं। और अब जब कथा अपनी गति खो चुकी है, तुम वाक्यों के बीच अटक गए हो—एक अधूरा अल्पविराम, जो पूर्ण विराम बनने से डरता है।

तुम्हारे भीतर जो आवाज़ थी, वह अब प्रतिध्वनि में बदल चुकी है। तुम बोलते हो, लेकिन तुम्हारे शब्द लौटकर तुम्हें ही घेर लेते हैं—जैसे कोई बंद गुफा, जहाँ हर ध्वनि अपनी ही परछाई से टकराती है। अब तुम संवाद नहीं करते, केवल अपनी ही उपस्थिति का प्रमाण देते रहते हो।

तुम्हें याद है—कभी तुमने भविष्य की कल्पना की थी। वह भविष्य अब वर्तमान में है, लेकिन उसमें तुम्हारा कोई स्थान नहीं। तुम अपने ही समय से विस्थापित हो चुके हो। जैसे एक पुरानी घड़ी, जो अब भी चल रही है, पर किसी के काम की नहीं।

अब प्रश्न यह नहीं कि तुम क्या करोगे। प्रश्न यह है कि तुम जो हो, उसे कैसे सहोगे।

तुम अपनी ही चेतना के बोझ से झुके हुए हो। तुम जानते हो कि भूल जाना संभव नहीं, और याद रखना असहनीय है। तुम एक ऐसे पुल पर खड़े हो, जो किसी किनारे तक नहीं जाता—और फिर भी गिरता नहीं।

क्या तुम इस शून्य को स्वीकार करोगे?

या उसे अर्थ देने की एक और असफल कोशिश करोगे?

तुम्हारे पास विकल्प नहीं हैं—सिर्फ अवस्थाएँ हैं।

और हर अवस्था तुम्हें धीरे-धीरे एक और परत में बदल रही है।

शायद एक दिन,

तुम स्वयं को पहचानना बंद कर दोगे

और वही तुम्हारी मुक्ति होगी।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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