तुम — एक सुकून की तरह
तुम,
मेरी ज़िंदगी की भीड़ में
एक शोर नहीं,
एक ठहराव हो
जहाँ मैं
बिना कुछ कहे भी
सुना जाता हूँ।
तुम्हारे साथ
रिश्तों को नाम देने की
कोई जल्दी नहीं,
कोई दावा नहीं,
बस एक सहज-सा साथ है
जो बिना बोले
खुद को सही ठहराता रहता है।
तुम
मेरी बातों की गंभीरता नहीं,
उनकी थकान समझती हो
जब मैं हँसते-हँसते
थोड़ा चुप हो जाता हूँ,
तुम उसी चुप्पी को
बात बना लेती हो।
तुम्हारे पास
कोई प्रश्न नहीं होते,
न ही कोई शिकायत,
बस एक अजीब-सी समझ होती है—
जो पूछती नहीं,
पर जानती बहुत कुछ है।
तुम
वो रिश्ता हो
जिसे समझाने की ज़रूरत नहीं,
जिसे छुपाने का भी कोई कारण नहीं
बस रहने देने का मन करता है
जैसे कोई धूप
खिड़की पर चुपचाप बैठी हो।
मैंने कभी
तुम्हें पाने की इच्छा नहीं की,
और शायद इसी वजह से
तुम्हें खोने का डर भी नहीं है
तुम
मेरे हिस्से की वो सच्चाई हो
जो बिना माँगे
मिल जाती है।
तुम्हारे साथ
ज़िंदगी थोड़ी कम जटिल लगती है,
थोड़ी कम भारी
जैसे किसी ने
मेरे कंधों से
अनकहे बोझ
धीरे से उतार दिए हों।
तुम,
मेरी कहानी की
कोई प्रेमिका नहीं
पर एक ऐसा अध्याय हो
जिसे मैं
कभी छोड़ना नहीं चाहता।
तुम
एक दोस्त नहीं,
एक एहसास हो
जो नामों से परे है,
पर हर नाम से ज़्यादा सच्चा।
मुकेश ,,,,,,,,,
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