तुम—छोटी बातों की बड़ी किताब
तुम
छोटी-छोटी बातों को
यूँ सहेज लेती हो,
जैसे वे ही
सबसे बड़ी कहानियाँ हों।
तुम्हारी दुनिया में
कुछ भी मामूली नहीं
एक अधूरी मुस्कान,
एक उलझा हुआ वाक्य,
या मेरी जेब में रखा
वो बेकार-सा रुमाल भी।
तुम
हर छोटी बात को
एक पन्ना बना देती हो,
और फिर
धीरे-धीरे
उसे पढ़ती रहती हो
बार-बार,
बिना ऊबे।
तुम्हें याद है
मैंने कब
बिना वजह “ठीक हूँ” कहा था,
और कब
“ठीक” के पीछे
कुछ छुपा लिया था।
तुम्हें ये भी याद है
किस दिन
मैंने बातों में
किसी और का नाम
थोड़ा ज़्यादा ले लिया था,
और तुम
बनावटी गुस्से में
थोड़ी देर के लिए
खुद को समेट लिया था।
तुम
सवाल नहीं करती,
बस जोड़ती रहती हो
छोटी-छोटी बातों को,
जैसे कोई धागे,
और उनसे
एक पूरी तस्वीर बुन लेती हो।
और मैं
मैं अक्सर
बड़ी-बड़ी बातों में उलझा रहता हूँ,
और तुम
छोटी-छोटी बातों से
मुझे समझ लेती हो।
तुम्हारी ये किताब
जिसमें कोई मोटा अक्षर नहीं,
कोई बड़ा शीर्षक नहीं—
बस छोटे-छोटे पन्ने हैं,
पर हर पन्ने में
एक पूरी दुनिया लिखी है।
तुम
वाकई
छोटी बातों की
सबसे बड़ी किताब हो…
मुकेश ,,,,,,,,,
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