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Wednesday, 29 April 2026

पानी में लिखी इबारतें

 पानी में लिखी इबारतें - (एक दार्शनिक गद्य-उपन्यास)

नदी के किनारे जन्मा आदमी

वह आदमी किसी शहर में पैदा नहीं हुआ था।

वह नदी के किनारे अचानक पाया गया था—जैसे किसी ने उसे रख दिया हो और भूल गया हो कि वह किसका है।


उसके भीतर एक अजीब बेचैनी थी।

वह पानी को देखता तो उसे लगता कि यह बह नहीं रहा,

बल्कि कुछ याद कर रहा है।


लोग उसे “चुप रहने वाला” कहते थे।

पर सच यह था—

वह सुनता बहुत था।

पानी की आवाज़ों को, हवा के टूटते वाक्यों को, और समय की धीमी करवटों को।


पहला वाक्य जो पानी में लिखा गया


एक दिन उसने झुककर नदी में अपनी उंगलियाँ डुबो दीं।

उसे लगा जैसे पानी ने उसे पढ़ लिया हो।


उसने कहा—

“मैं कौन हूँ?”


पानी कुछ देर चुप रहा।

फिर बहने लगा।


और उसी बहाव में उसे लगा कि उत्तर भी बह गया है।

उस दिन उसे पहली बार समझ आया

कुछ प्रश्नों का उत्तर नहीं होता,

वे केवल बदल जाते हैं।


वह शहर में रहने लगा,

पर शहर उसके भीतर नहीं आया।


हर चेहरा उसे अधूरा लगता था।

हर बातचीत में उसे कोई ग़ायब शब्द सुनाई देता था।


रातों में वह सोचता

क्या लोग भी पानी में लिखी इबारतें हैं?


जो मिलते हैं,

और थोड़ी देर बाद

किसी और रूप में बह जाते हैं।


एक दिन वह पहाड़ों पर गया।

वहाँ एक झरना था

जो टूटकर गिर रहा था,

फिर भी पूरा लग रहा था।


उसने झरने से कहा

“तुम गिरते क्यों हो?”


झरना हँसा नहीं,

पर उसकी आवाज़ में एक कंपन था

“मैं गिर नहीं रहा, मैं लौट रहा हूँ।”


उस दिन उसे पहली बार लगा

कि गिरना भी एक तरह का लौटना हो सकता है।


धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा

कि समय कोई रेखा नहीं है।


वह एक नदी है

जो खुद को ही पीती रहती है।


लोग कहते हैं

अतीत चला गया।


पर पानी में उसे हमेशा

अतीत की परछाइयाँ दिखती थीं

जैसे वह अभी भी वहीं हो।


एक रात वह नदी के किनारे बैठा रहा।

बहुत देर तक कुछ नहीं बोला।

फिर उसने धीरे से कहा

“अगर मैं भी पानी हूँ, तो मैं कहाँ हूँ?”


और उस क्षण

उसे कोई उत्तर नहीं मिला

क्योंकि प्रश्न भी

पानी में घुल चुका था।


सुबह जब लोग आए

तो वहाँ केवल नदी थी।

आदमी नहीं।


कहते हैं

उसके बाद नदी और शांत हो गई।


पर जो लोग ध्यान से सुनते हैं

उन्हें आज भी लगता है

पानी कुछ कहता है।


न शब्दों में,

न आवाज़ में,

बल्कि एक गहरे अर्थ में।


जैसे कोई पुराना वाक्य

जो कभी पूरा नहीं लिखा गया,

और अब

हर बहाव में पूरा हो रहा है।


अब कोई पात्र नहीं बचता।

कोई कहानी नहीं बचती।


सिर्फ एक प्रवाह है

जो खुद को पढ़ता भी है,

और खुद को मिटाता भी है।


और यही समझ आती है

कि “पानी में लिखी इबारतें”

कभी मनुष्य ने नहीं लिखीं।


वे तो हमेशा से

पानी ही लिख रहा था

अपने भीतर।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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