उदासी — एक विलंबित अर्थ

 उदासी — एक विलंबित अर्थ


उदासी कभी सीधे नहीं आती।

वह दरवाज़ा खटखटाती भी नहीं

बस किसी आधे खुले झरोखे से भीतर उतरती है,

जैसे धूप नहीं, धूप की स्मृति।


पाठक, तुम जब इसे पढ़ रहे हो,

शायद तुम पहले से ही उस जगह में हो

जहाँ शब्द अपने अर्थों को स्थगित कर देते हैं।

यहाँ “क्यों” का कोई एक उत्तर नहीं,

बल्कि उत्तरों का एक फैलता हुआ वृत्त है

जिसका केंद्र हर बार बदल जाता है।


उदासी, संभवतः, उस क्षण की उपज है

जब कोई बात पूरी कही नहीं जाती

और जो कही जाती है,

वह कुछ और छुपाने लगती है।


तुमने कभी गौर किया है?

जब कोई कहता है—“मैं ठीक हूँ”

तो उस “ठीक” के भीतर

कितनी असंख्य दरारें छुपी होती हैं।

शब्द वहाँ उपस्थित होते हैं,

पर उनका अर्थ अनुपस्थित।


और शायद यही अनुपस्थिति,

धीरे-धीरे, रस बन जाती है

एक ऐसा रस जो स्वाद में कड़वा नहीं,

पर मीठा भी नहीं

बल्कि किसी भूली हुई अनुभूति की तरह

जीभ पर ठहरता है।


उदासी का रस

वह करुण नहीं, वह शृंगार भी नहीं,

वह उनके बीच की कोई तीसरी अवस्था है,

जहाँ प्रेम अपने अभाव से टकराता है,

और स्मृति अपने ही विस्मरण में बदल जाती है।


पाठक, तुम इस गद्य को पढ़ते हुए

शायद किसी और जगह पहुँच रहे हो

जहाँ तुम्हारी अपनी उदासी

इन शब्दों से मिलकर

एक नया अर्थ गढ़ रही है।


पर सावधान—

यह अर्थ स्थायी नहीं है।

जैसे ही तुम उसे पकड़ने की कोशिश करोगे,

वह किसी और अर्थ में बदल जाएगा।


उदासी, दरअसल, वही खेल है

जहाँ अर्थ खुद को लगातार टालता है,

और हम, उसे पाने की कोशिश में,

और गहरे उसमें उतरते जाते हैं।


कभी-कभी,

यह उतरना ही आनंद बन जाता है—

एक अजीब-सी शांति,

जो किसी निष्कर्ष से नहीं,

बल्कि अधूरेपन से जन्म लेती है।


तो क्या उदासी की वजह है?

या वह केवल एक बहाना है—

अपने भीतर के उस खाली स्थान को महसूस करने का,

जिसे हम सामान्य दिनों में

अनदेखा कर देते हैं?


शायद, उदासी वही स्थान है—

जहाँ तुम अपने सबसे पास होते हो,

और फिर भी

खुद को छू नहीं पाते।


और यही उसका रस है—

एक ऐसा रस,

जो पूर्णता में नहीं,

बल्कि निरंतर विलंब में

अपनी मिठास खोजता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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