उस दिन बारिश हुई।
बिना किसी पूर्व सूचना के—
जैसे शहर की किसी फाइल में
यह दर्ज ही न रहा हो कि आज पानी गिरेगा।
वह ऑफिस से निकल रहा था
जब पहली बूंद उसके हाथ पर गिरी।
ठंडी।
एक क्षण के लिए
वह रुक गया।
फिर बारिश तेज़ हो गई।
लोग भागने लगे—
छाते खुलने लगे,
दुकानों के शटर आधे गिर गए,
और सड़क पर एक अजीब-सी हड़बड़ी फैल गई।
वह नहीं भागा।
वह वहीं खड़ा रहा।
पानी उसके कंधों पर,
चेहरे पर,
आँखों के पास गिरता रहा—
और धीरे-धीरे
उसे लगा कि यह सिर्फ बारिश नहीं है।
यह कुछ याद दिला रही है।
पहले धुंधली-सी—
फिर थोड़ा साफ—
एक चेहरा।
वह चौंका नहीं।
जैसे वह पहले से जानता हो
कि यह होगा।
वह स्त्री थी।
न कोई नाम,
न कोई निश्चित स्मृति—
बस एक उपस्थिति।
जैसे किसी पुराने वाक्य का आधा हिस्सा
जो कभी पूरा नहीं हुआ।
वह चलते-चलते
अचानक एक मोड़ पर रुक गया।
बारिश अब भी गिर रही थी।
उसे याद आया—
एक और दिन था,
कुछ साल पहले शायद,
जब इसी तरह बारिश हो रही थी
और वह उसके साथ चल रहा था।
“तुम्हें बारिश पसंद है?”
उसने पूछा था।
वह हँसी थी—
धीमी,
थोड़ी-सी झिझकती हुई।
“पसंद नहीं…
पर यह चीज़ों को साफ कर देती है।”
“क्या?”
उसने पूछा था।
“यादें,”
उसने कहा था,
और आगे बढ़ गई थी।
वह अब उसी जगह खड़ा था—
पर अकेला।
उसे अचानक गुस्सा आया।
एक अजीब-सा,
बिना दिशा का गुस्सा।
उसने पास की दीवार पर हाथ मारा।
बारिश में भीगी दीवार ने
कोई प्रतिरोध नहीं किया।
“साफ नहीं करती,”
उसने धीमे से कहा,
“यह बस… घोल देती है।”
उसकी आवाज़ बारिश में खो गई।
वह चलने लगा—
तेज़,
बिना देखे कि कहाँ जा रहा है।
हर बूंद अब
उसे एक स्मृति की तरह लग रही थी।
कुछ साफ,
कुछ टूटी हुई,
कुछ ऐसी
जो कभी हुई ही नहीं थी
पर फिर भी याद थीं।
उसने सोचा—
क्या स्मृति सच होती है?
या वह भी
किसी पानी की तरह है
जो हर बार
नई शक्ल ले लेता है?
मुकेश ,,,,,,,,
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