नीरस स्त्री से प्रेम
एक नीरस स्त्री से प्रेम करना
सचमुच बेहद कठिन होता है
क्योंकि वह
तुम्हारे शब्दों से नहीं,
तुम्हारी चुप्पियों से बात करती है।
वह हँसती भी है तो
जैसे कोई ऋतु बिना शोर बदले,
धीरे से—
तुम्हें बताए बिना।
तुम पूछते हो—
“क्या तुम मुझसे प्रेम करती हो?”
और वह
मुस्कान में उत्तर टाल देती है,
जैसे प्रेम कोई घोषणा नहीं,
एक निजी साधना हो।
उसके पास
न शिकायतों की सूची है,
न इच्छाओं का बाज़ार—
वह तुम्हें
तुम्हारे ही भीतर छोड़ देती है,
जहाँ तुम
अपने प्रश्नों से जूझते हो।
वह दूरी बनाकर बैठती है,
जैसे प्रेम में भी
मर्यादा का एक व्रत हो,
और तुम
उस दूरी को
अपनी अस्वीकृति समझ बैठते हो।
पर सच तो यह है
वह तुम्हें
तुमसे बचा रही होती है।
उसकी नाराज़गी भी
कोई तूफ़ान नहीं,
बस एक लंबा मौन है—
जिसमें तुम्हारे शब्द
खुद से टकराकर
वापस लौट आते हैं।
एक नीरस स्त्री से प्रेम करना
दरअसल
खुद से प्रेम करना सीखना है
बिना शोर,
बिना प्रमाण,
बिना किसी उत्तर की उम्मीद के।
और शायद
यही सबसे कठिन है
कि जहाँ प्रेम
प्रदर्शन नहीं,
धैर्य बन जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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