तुम—साड़ियों के रंगों में
तुम—साड़ियों के रंगों में
हो सकता है
महँगी साड़ियों में
तुम और निखर जाती हो—
रेशम की चमक
तुम्हारे चेहरे तक आ जाती हो,
और हर तह में
एक उत्सव-सा खुलता है…
पर मुझे—
तुम हर साड़ी में अच्छी लगती हो,
क्योंकि साड़ी नहीं,
तुम उसे अर्थ देती हो।
वो बनारसी लाल,
जब तुम किसी उत्सव-सी लगती हो—
जैसे पूरा घर
तुम्हारे इर्द-गिर्द रोशन हो गया हो।
वो कांजीवरम सोना,
जब तुम्हारे चलने में
एक गरिमा उतर आती है—
धीमी, ठहरी हुई।
वो चंदेरी हल्का हरा,
जब तुम बस यूँ ही
दिन को पहन लेती हो—
सादा, सहज, खुला हुआ।
वो तसर का मटमैला रंग,
जब तुम अपने में सिमटी रहती हो,
जैसे कोई पुरानी किताब
खुद को धीरे-धीरे खोल रही हो।
वो नीली कॉटन साड़ी,
जिसमें तुम
सबसे ज़्यादा अपनी लगती हो—
बिना किसी दिखावे के,
बस एक सच्ची-सी उपस्थिति।
और फिर—
कभी-कभी
तुम बिना किसी खास साड़ी के,
बस साधारण कपड़ों में भी होती हो,
जहाँ कोई ब्रांड नहीं,
कोई नाम नहीं—
बस तुम हो,
अपने सबसे असली रूप में।
सच कहूँ—
साड़ियाँ तुम्हें नहीं सजातीं,
तुम साड़ियों को जीवन देती हो।
और मेरे लिए—
इतने रंगों, इतने नामों के बावजूद,
एक ही रंग ठहरता है—
तुम्हारा होना।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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