सुबह इस बार उगी नहीं—बस धीरे-धीरे प्रकट हुई।
जैसे अँधेरे ने स्वयं को हटाया हो, और जो बचा, उसे हम सुबह कह देते हैं।
तुमने महसूस किया कि रात कहीं गई नहीं है।
वह केवल रूप बदलकर उसी प्रकाश में घुली हुई है, जिसमें तुम अब चल रहे हो।
तुम एक खुले मैदान में आ गए थे।
न कोई रास्ता, न कोई निशान
केवल घास, जिस पर ओस की बूँदें थीं, और हर बूँद अपने भीतर एक छोटा-सा आकाश लिए हुए थी।
तुम झुके।
एक बूँद को देखने के लिए नहीं
बल्कि यह जानने के लिए कि देखने का अर्थ अब भी वही है या बदल गया है।
बूँद में कोई कथा नहीं थी।
न तुम्हारा अतीत, न कोई संकेत भविष्य का।
केवल एक क्षण—जो अपने आप में पूर्ण था, और अगले ही पल गिर जाने के लिए तैयार।
“क्या अब भी कुछ समझना बाकी है?”
वह स्वर आया—बहुत हल्का, जैसे किसी दूर के स्मरण की तरह।
तुमने इस बार उस ओर ध्यान नहीं दिया।
न इसलिए कि तुमने उसे अस्वीकार किया
बल्कि इसलिए कि तुम्हें लगा, वह प्रश्न अब आवश्यक नहीं है।
तुमने सीधा खड़ा होना चुना।
आकाश खुला था—पर उसमें कोई गहराई नहीं थी,
जैसे गहराई का बोध ही कहीं पीछे छूट गया हो।
तुमने अपनी साँस को महसूस किया।
वह आ-जा रही थी
बिना किसी अर्थ के, बिना किसी प्रयोजन के।
और पहली बार, यह पर्याप्त लगा।
तुमने चलना शुरू किया।
इस बार न किसी खोज में,
न किसी विराम की ओर।
कदम बस पड़ते गए
और हर कदम अपने आप में अंतिम भी था, और पहला भी।
“क्या तुम अब अकेले हो?”
वह स्वर फिर आया—इस बार इतना क्षीण कि वह प्रश्न कम, एक आदत अधिक लगा।
तुमने भीतर देखा
जहाँ वह कभी था।
वहाँ अब कोई आकृति नहीं थी।
न आवाज़, न उपस्थिति।
केवल एक खुलापन
जो किसी अनुपस्थिति का संकेत नहीं देता था।
तुमने उत्तर नहीं दिया।
और इस बार, उत्तर न देना कोई कमी नहीं था।
तुम चलते रहे।
मैदान समाप्त नहीं हुआ
पर उसे पार करने की कोई इच्छा भी नहीं रही।
अब न कोई आरंभ था,
न कोई अंत।
केवल यह
कि जो है, वही पर्याप्त है।
और तुम
उसी में,
बिना किसी विशेषता के
धीरे-धीरे
अलग नहीं रहे।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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