रात इस बार बिना किसी प्रस्तावना के आई।
न धीरे-धीरे, न किसी रंग-परिवर्तन के साथ—बस एकाएक, जैसे किसी ने दृश्य की पृष्ठभूमि बदल दी हो और पात्रों को बताया भी न हो।
तुम चलते रहे।
अब यह जानना कठिन था कि तुम किसी स्थान से गुजर रहे हो, या स्थान तुमसे।
सड़क के किनारे एक आदमी बैठा था।
उसके सामने एक छोटा-सा दीपक जल रहा था—हवा नहीं थी, फिर भी लौ स्थिर नहीं थी।
तुम उसके पास रुके नहीं,
पर तुम्हारी दृष्टि वहाँ ठहर गई।
“तुम देख रहे हो, या केवल पहचान रहे हो?”
वह स्वर फिर आया—इस बार कुछ और विरल, जैसे वह भी अपनी उपस्थिति को कम कर रहा हो।
तुमने उत्तर नहीं दिया।
क्योंकि तुम्हें पहली बार यह लगा कि देखना और पहचानना दो अलग क्रियाएँ हैं—और तुम अब तक अधिकतर पहचानते ही रहे हो।
तुमने फिर उस दीपक को देखा।
इस बार बिना यह सोचे कि यह क्या है।
लौ में कोई कथा नहीं थी,
कोई प्रतीक नहीं,
कोई अर्थ भी नहीं—
फिर भी वह तुम्हें रोक रही थी।
उस आदमी ने सिर उठाया।
उसकी आँखों में कोई आग्रह नहीं था, न ही तुम्हारे होने की कोई पुष्टि।
“तुम कुछ ढूँढ़ रहे हो?”
उसने पूछा—जैसे यह प्रश्न तुम्हारे लिए नहीं, स्वयं के लिए हो।
तुमने सिर हिलाया—न हाँ में, न ना में।
यह एक ऐसी हरकत थी, जो केवल इस बात का संकेत थी कि तुम उत्तर देने की स्थिति में नहीं हो।
वह फिर चुप हो गया।
और तुमने देखा कि उसकी चुप्पी में कोई कमी नहीं है—जैसे शब्दों की अनुपस्थिति ने कुछ घटाया नहीं, बल्कि पूरा किया हो।
तुम आगे बढ़े।
अब कदमों में कोई योजना नहीं थी,
न ही किसी निष्कर्ष की ओर बढ़ने का आग्रह।
“क्या तुम अब भी मुझे सुन रहे हो?”
वह—जो हर बार तुम्हारे साथ था—इस बार बहुत दूर से आया।
तुम रुके नहीं।
तुमने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा।
क्योंकि तुम्हें यह समझ आने लगा था कि
हर सहारा, चाहे वह कितना ही सूक्ष्म क्यों न हो,
एक आदत बन सकता है।
और तुम—
धीरे-धीरे आदतों से बाहर आ रहे थे।
रात और गहरी हो गई।
अब दृश्य कम थे,
पर जो भी था, वह अधिक स्पष्ट था—जैसे अँधेरा चीज़ों को छिपाता नहीं, बल्कि उनके अनावश्यक हिस्सों को हटा देता है।
तुमने अपनी चाल को महसूस किया—
न तेज़, न धीमी—
बस उपस्थित।
और उसी उपस्थिति में
तुमने पहली बार यह नहीं सोचा कि आगे क्या है।
न ही यह कि पीछे क्या था।
तुम केवल चल रहे थे—
बिना कथा के,
बिना साक्षी के भी शायद।
और जहाँ “वह” कभी था—
वहाँ अब एक हल्की-सी जगह बची थी,
जो खाली नहीं थी,
पर किसी से भरी हुई भी नहीं।
तुमने उसे छुआ नहीं।
तुमने उसे नाम भी नहीं दिया।
बस उसके साथ चलते रहे
जैसे वह तुम्हारा नहीं,
और फिर भी
तुम्हारे बिना भी नहीं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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