रूह पर ठहरे हुए मौसम
कभी जाते ही नहीं,
बस चुपचाप
अपनी धुंध फैलाए रहते हैं।
किसी को क्या ख़बर
कि भीतर कितनी बारिशें हैं,
कितनी पतझड़ें
अब तक पत्तों-सी झरती रहती हैं।
तेरी जुदाई का सर्द झोंका
आज भी कहीं जमा है सीने में,
और तेरी याद की धूप
कभी-कभी हल्की-सी पिघला देती है
उस जमी हुई ख़ामोशी को।
ये मौसम अजीब हैं
न पूरी तरह बदलते हैं,
न पूरी तरह रुकते हैं;
बस एक अधूरी शाम की तरह
लंबे होते जाते हैं।
मैंने सीखा है
इन ठहरे हुए लम्हों के साथ जीना,
इनकी ठंडक में
एक नर्म-सी तपिश ढूँढ लेना।
अब रूह का आसमान
बादलों से खाली भी हो जाए
तो भी
उनकी छाया कहीं रह जाती है।
शायद इश्क़ का असर ही यही है
मौसम गुज़र जाते हैं,
पर उनकी आहट
रूह पर
हमेशा ठहरी रहती है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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