निर्गुण नृत्य — नाम की चदरिया
दोहा
नाम चदरिया ओढ़ि के, नाचउँ दिन अरु रैन।
सत रज तम तिन रंग सों, रंगि गयो सब भैन॥
चौपाई
सत सुधा सम उजियारो होई। रज चंचल चित गति सब खोई॥
तम अँधियार गहन संसारा। नाम दीप उर बीच उजारा॥
त्वचा रक्त अरु मांस पचारा। मेद अस्थि मज्जा आधाराँ॥
शुक्र बिंदु जीवन के धामा। सात धातु तन तासु ही नामा॥
दोहा
पृथिवी जल अनल पवन, गगन विशाल अपार।
पंच तत्व मिलि देह यह, कीन्ही रूप विस्तार॥
चौपाई
मूलाधार धरनि सम ठाढ़ा। स्वाधिष्ठान रस सिन्धु अगाढ़ा॥
मणिपुर अनल जठर प्रगासा। अनाहत प्रेम सुधा निवासा॥
विशुद्धि बाजे शब्द निराला। आज्ञा दीपक ज्ञान उजाला॥
सहस्रार कमल जब फूला। अमिय बरसि मिटि गयो सब सूला॥
दोहा
बहत्तर सहस नाड़ियाँ, देह जाल विस्तार।
इड़ा पिंगला सुषुम्ना, नामहि आधार॥
चौपाई
वाक् हस्त पद पायु उपस्था। पाँच कर्म रत हरि पर आस्था॥
नयन श्रवन घ्राण रसना। त्वचा जानै लीला सपना॥
शब्द स्पर्श अरु रूप रस गंधा। पाँच तन्मात्रा जग के बंधा॥
मन महत अहंकार समेता। प्रकृति मूल रचे सब खेता॥
दोहा
चौबीस तत्त्वन नाचते, लीला अपरम्पार।
जब तिनु गुण सब सम भए, रह्यो नाम आधार॥
चौपाई (समापन)
छूटि गए देहिक सब फंदा। मिटि गयो संसृति करि छंदा॥
रंग उतरि गए तिनु भाई। नाम रंग अटल रहि जाई॥
चदरिया यह देह पुरानी। धूरि भई सब मान कहानी॥
नामहि नाचत रह्यो अघाई। निर्गुण धाम सहज सुख पाई॥
अंतिम दोहा
देह चदरिया छोड़ि जब, टूटे सकल बंधैन।
दास कहै निर्गुण मिल्यो, तूहि सुख तूहि चैन॥
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment