अध्याय 3.6 कथा और समय : अतीत, वर्तमान और भविष्य का आवागमन
अध्याय 3.6 कथा और समय : अतीत, वर्तमान और भविष्य का आवागमन महाभारत की कथा को केवल घटनाओं के कालक्रम में पढ़ना उसके एक महत्वपूर्ण शिल्पगत पक्ष को छिपा देता है। घटनाएँ जिस क्रम में घटित हुई हैं, कथा उन्हें आवश्यक नहीं कि उसी क्रम में प्रस्तुत करे। कभी वह पीछे जाती है, कभी किसी पूर्व घटना को बहुत बाद में सामने लाती है, कभी आने वाले परिणाम का संकेत पहले दे देती है और कभी किसी एक क्षण को इतना विस्तार देती है कि बाहरी समय लगभग ठहर-सा जाता है। इसलिए यहाँ दो समयों में अंतर करना उपयोगी है— घटनाओं का समय और कथा का समय । इसी अंतर को कुछ ठोस उदाहरणों से समझना अधिक उचित होगा। वर्तमान से कई पीढ़ियाँ पीछे : शांतनु और देवव्रत महाभारत की कुरुवंशीय कथा को समझते हुए हम शांतनु, गंगा और देवव्रत की कथा तक पहुँचते हैं। देवव्रत की प्रतिज्ञा तत्कालीन परिस्थिति में ली गई थी। सत्यवती के पुत्रों को हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी बनाने के लिए देवव्रत स्वयं राजसिंहासन और विवाह का अधिकार त्याग देते हैं। लेकिन कथा यहीं समाप्त नहीं होती। एक क्षण में लिया गया यह निर्णय आगे की पीढ़ियों की राजनीतिक और पारिवारिक संरचना क...