महाभारत - अध्याय 3.2 कथा के भीतर कथा : आख्यान की बहुस्तरीय संरचना

 अध्याय 3.2

कथा के भीतर कथा : आख्यान की बहुस्तरीय संरचना

महाभारत को पढ़ते समय एक विचित्र अनुभव होता है।

हम एक कथा सुन रहे होते हैं, लेकिन अचानक पता चलता है कि उस कथा को कोई दूसरा व्यक्ति किसी तीसरे व्यक्ति से कह रहा है। उस तीसरे व्यक्ति ने उसे किसी और से सुना है। और उस कथा के भीतर फिर कोई पात्र किसी पुराने प्रसंग को सुनाने लगता है।

इस प्रकार महाभारत में कथा केवल घटनाओं का क्रम नहीं रहती।

वह कथन की परतों में व्यवस्थित होती है।

यही उसकी रचना-संरचना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है।

घटना और उसके कथन में अंतर

किसी घटना के दो स्तर होते हैं। पहला— घटना स्वयं।

दूसरा— उस घटना का किसी के द्वारा कहा जाना।

महाभारत में इन दोनों के बीच दूरी दिखाई देती है। कुरुक्षेत्र का युद्ध घटित होता है।

लेकिन पाठक युद्ध को सीधे नहीं देख रहा। वह किसी कथावाचक से उसकी कथा सुन रहा है।

और वह कथावाचक भी स्वयं उस घटना का प्रत्यक्ष दर्शक नहीं हो सकता। 

इसलिए पाठक के सामने केवल— “क्या हुआ?” नहीं आता। साथ ही यह प्रश्न भी आता है— “किसने यह बताया?”

और— “उसने यह किससे सुना?” यहीं से महाभारत की कथन-संरचना का वास्तविक अध्ययन शुरू होता है।

उग्रश्रवा सौति और शौनक

महाभारत के आदिपर्व में एक महत्वपूर्ण कथन-स्थिति सामने आती है।

नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषियों का सत्र चल रहा है। वहाँ उग्रश्रवा सौति आते हैं।

ऋषि उनसे विभिन्न आख्यान सुनना चाहते हैं। सौति महाभारत की कथा सुनाते हैं।

लेकिन यहाँ प्रश्न उठता है— सौति ने यह कथा स्वयं देखी थी क्या? नहीं।

वे स्वयं बताते हैं कि उन्होंने इसे अन्य स्रोत से सुना है। 

इससे कथा तुरंत एक दूसरी परत ग्रहण कर लेती है।

पाठक महाभारत को केवल एक कथावाचक की आवाज में नहीं सुन रहा। 

वह एक ऐसी परंपरा सुन रहा है जिसमें— एक वक्ता दूसरे वक्ता की कही हुई कथा को आगे पहुँचा रहा है।

वैशम्पायन और जनमेजय

इसके भीतर दूसरी महत्वपूर्ण परत है।

जनमेजय के सर्पसत्र में वैशम्पायन महाभारत की कथा सुनाते हैं। परंपरा के अनुसार वैशम्पायन ने यह कथा व्यास से प्राप्त की। अब संरचना को देखें— व्यास → वैशम्पायन → जनमेजय → उग्रश्रवा सौति → शौनकादि ऋषि → पाठक, यह एक साधारण कथा-क्रम नहीं।

यह कथन-परंपरा की श्रृंखला है। कथा एक व्यक्ति से दूसरे तक पहुँचती है। हर स्तर पर एक नया श्रोता आता है।

और उसी के साथ कथा का प्रसंग भी बदलता है।

कथा का “फ्रेम”

ऐसी संरचना को आधुनिक साहित्यिक अध्ययन में frame narrative अर्थात् “फ्रेम-कथा” कहा जा सकता है।

एक बाहरी कथा किसी दूसरी कथा को अपने भीतर रखती है। फिर दूसरी कथा के भीतर तीसरी कथा आ सकती है।

महाभारत में यह तकनीक अत्यंत विस्तृत रूप ग्रहण करती है। बाहरी स्तर पर ऋषियों का सत्र है।

उसमें सौति हैं। सौति के कथन में जनमेजय का सर्पसत्र आता है। उसके भीतर वैशम्पायन का कथन आता है।

और उसके भीतर अनेक पात्र अपनी-अपनी कथाएँ कहते हैं।

इस प्रकार— महाभारत केवल कथा नहीं कहता; वह कथा कहे जाने की परिस्थितियों को भी कथा का हिस्सा बना देता है।

यह संरचना क्यों महत्वपूर्ण है?

पहली दृष्टि में यह केवल साहित्यिक तकनीक लग सकती है।

लेकिन इसका प्रभाव बहुत गहरा है।

यदि कोई कथावाचक किसी पात्र की कथा कह रहा है, तो वह कथा एक विशेष दृष्टिकोण से हमारे सामने आती है।

वह किस प्रसंग में कही जा रही है, यह भी महत्वपूर्ण है।

उदाहरण के लिए, यदि कोई कथा किसी राजा को संकट की स्थिति में सुनाई जा रही है, तो उसका अर्थ केवल उस पुराने राजा के जीवन का विवरण नहीं रह जाता।

वह वर्तमान श्रोता की समस्या का उत्तर भी बन जाती है। इसलिए— कथन का प्रसंग कथा के अर्थ को प्रभावित करता है।

श्रोता केवल सुनने वाला नहीं

महाभारत की संरचना में श्रोता की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। श्रोता की परिस्थिति के अनुसार कथा का चयन होता है।

किसी श्रोता को धर्म का प्रश्न है। किसी को मृत्यु का भय। किसी को राज्य की चिंता। किसी को युद्ध का संकट।

किसी को तपस्या का प्रश्न। किसी को वंश की जानकारी चाहिए। 

इसलिए एक ही प्रकार की कथा हर स्थान पर नहीं आती।  कथा का चुनाव— श्रोता की आवश्यकता से जुड़ता है। यह महाभारत की कथन-पद्धति को अत्यंत जीवंत बनाता है।

जनमेजय का सर्पसत्र : कथा कहने का प्रसंग

जनमेजय के सर्पसत्र को केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक घटना की तरह पढ़ना पर्याप्त नहीं।

वह स्वयं महाभारत की कथन-व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण फ्रेम है।

जनमेजय अपने पिता परीक्षित की मृत्यु और नागों से संबंधित प्रसंगों के कारण एक विशेष मानसिक और राजनीतिक स्थिति में है।

उसी संदर्भ में पुरानी वंशकथा सामने आती है। इसका परिणाम यह होता है कि— कुरुवंश का अतीत जनमेजय के वर्तमान से जुड़ जाता है।

अतीत केवल सुनाया नहीं जा रहा। वह वर्तमान श्रोता के सामने किसी प्रयोजन से पुनः उपस्थित किया जा रहा है।

सौति का कथन : दूसरी स्मृति का प्रवेश

अब बाहरी फ्रेम में लौटें।

शौनक और अन्य ऋषि सौति से कथा सुन रहे हैं। 

इससे जनमेजय की सभा स्वयं एक दूसरी स्मृति का विषय बन जाती है।

अर्थात्— जनमेजय ने वैशम्पायन से सुना। सौति ने उस परंपरा को सुना। शौनक ने सौति से सुना। और अब पाठक उस कथन को पढ़ रहा है।

इस संरचना में महाभारत एक जीवित श्रुति-परंपरा का साहित्यिक रूप प्रस्तुत करता है—हालाँकि इसे वैदिक “श्रुति” के तकनीकी अर्थ में नहीं लेना चाहिए।

यहाँ “श्रवण” का अर्थ है— स्मृति का एक व्यक्ति से दूसरे तक संचार।

व्यास की भूमिका

इस पूरी संरचना में व्यास की भूमिका विशेष है।

परंपरा में वे केवल कथा के रचयिता नहीं माने जाते।

वे— कथाकार, पात्र,  वंश-स्मृति के धारक, और कथा-परंपरा के मूल स्रोत के रूप में अनेक स्तरों पर उपस्थित हैं।

इससे एक रोचक स्थिति बनती है।

जिस व्यक्ति को परंपरा महाभारत का रचयिता मानती है, वही महाभारत की कथा के भीतर एक पात्र के रूप में भी उपस्थित है।

अर्थात्— कथाकार स्वयं कथा-संसार के भीतर प्रवेश कर जाता है।

यह महाभारत की रचना को सामान्य बाहरी लेखक–आंतरिक कथा संबंध से अलग बनाता है।

कथाकार और पात्र की सीमा

व्यास का उदाहरण हमें एक और महत्वपूर्ण प्रश्न तक ले जाता है। आम तौर पर हम लेखक को कथा के बाहर रखते हैं। लेकिन महाभारत में व्यास स्वयं घटनाओं में भाग लेते हैं।

वे धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर के जन्म की कथा से जुड़े हैं। वे पांडवों और कौरवों की पीढ़ी के समकालीन हैं।

फिर भी वही व्यास व्यापक महाभारत-परंपरा के कथाकार के रूप में उपस्थित हैं।

इससे कथा के भीतर— लेखक, पात्र और कथाकार की सीमाएँ कभी-कभी एक-दूसरे को स्पर्श करती हैं।

यह महाभारत की बहुस्तरीयता का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

संजय की दृष्टि : एक और कथन-स्तर

कुरुक्षेत्र का युद्ध भी सीधे पाठक को नहीं दिखाया जाता। धृतराष्ट्र के प्रश्न के उत्तर में संजय युद्ध का वर्णन करते हैं।

यहाँ एक विशेष कथन-स्थिति बनती है। धृतराष्ट्र देख नहीं सकता।

संजय उसे युद्ध का दृश्य बताते हैं। इस प्रकार पाठक युद्ध को— संजय की दृष्टि से देखता है।

यह केवल सूचना देना नहीं। यह दृष्टिकोण का निर्माण है।

किसी घटना को देखने और किसी दूसरे को उसका वर्णन करने के बीच अर्थ का एक स्तर जुड़ जाता है।

भगवद्गीता भी इसी संरचना में है

भगवद्गीता को यदि उसके कथात्मक संदर्भ से अलग कर दिया जाए, तो वह केवल एक स्वतंत्र दार्शनिक ग्रंथ जैसी दिखाई दे सकती है।

लेकिन महाभारत की संरचना में वह युद्धभूमि की एक विशिष्ट परिस्थिति में घटित— कृष्ण और अर्जुन का संवाद

है। और पाठक तक वह संवाद भी संजय के कथन के माध्यम से पहुँचता है।

इसलिए यहाँ कई स्तर एक साथ सक्रिय हैं— 

धृतराष्ट्र पूछता है। संजय बताता है। युद्धभूमि का दृश्य सामने आता है। अर्जुन प्रश्न करता है। कृष्ण उत्तर देते हैं।

इस प्रकार भगवद्गीता का दार्शनिक अर्थ उसकी कथात्मक स्थिति से अलग नहीं है।

कथन-परतें अर्थ को क्यों बदलती हैं?

मान लें कोई व्यक्ति किसी घटना का प्रत्यक्षदर्शी था। वह घटना दूसरे व्यक्ति को सुनाता है।

दूसरा व्यक्ति तीसरे को सुनाता है। तीसरा उस कथा को किसी विशेष प्रश्न के उत्तर में प्रस्तुत करता है।

अब कथा केवल घटना नहीं रही। उसमें— स्मृति, चयन, दृष्टिकोण, प्रसंग, श्रोता की आवश्यकता सभी जुड़ गए।

महाभारत इस प्रक्रिया को छिपाता नहीं।

वह कई बार स्वयं हमें बताता है कि— कथा कहाँ कही जा रही है और किससे कही जा रही है।

यह उसकी कथात्मक ईमानदारी का एक महत्वपूर्ण पक्ष भी माना जा सकता है।

क्या इससे कथा अविश्वसनीय हो जाती है?

आवश्यक नहीं। कथन की परतें होने का अर्थ यह नहीं कि कथा झूठी है।

लेकिन इसका अर्थ यह अवश्य है कि हमें— कथाकार और उसके कथन की स्थिति को समझना चाहिए।

ऐतिहासिक शोध के लिए यह और भी महत्वपूर्ण है।

किसी घटना का विवरण जितनी कथन-परतों से होकर आता है, उतनी ही सावधानी से हमें उसके स्रोत-स्वरूप को समझना होगा।

इसलिए बहुस्तरीय कथा— न स्वतः प्रमाण है, न स्वतः अप्रमाण।

वह पहले एक पाठीय तथ्य है, जिसकी व्याख्या आवश्यक है।

एक ही घटना के अनेक कथन

महाभारत में एक घटना या पात्र कभी-कभी विभिन्न प्रसंगों में अलग रूपों में सामने आता है।

यह आवश्यक नहीं कि हर अंतर विरोधाभास हो।

कई बार अलग कथन किसी घटना के अलग पक्ष को उजागर करते हैं।

इससे महाभारत हमें यह संभावना देता है कि— सत्य का अनुभव एक ही दृष्टिकोण से पूर्ण नहीं होता।

लेकिन यह दार्शनिक निष्कर्ष निकालने से पहले पाठीय स्तर पर यह देखना आवश्यक है कि विभिन्न कथन किस संदर्भ में आए हैं।

कथा का चयन भी अर्थपूर्ण है

किसी कथाकार के पास असंख्य कथाएँ हो सकती हैं।

वह उनमें से कौन-सी कथा सुनाता है?

यह स्वयं अर्थपूर्ण है।

यदि युधिष्ठिर के संकट में नल की कथा सुनाई जाती है, तो यह संयोग मात्र नहीं।

यदि मृत्यु के प्रश्न पर सावित्री की कथा आती है, तो उसका एक प्रसंगगत अर्थ है।

इसलिए उपाख्यान की उपस्थिति ही पर्याप्त अध्ययन-विषय नहीं।

हमें यह भी देखना होगा— वह कथा ठीक उसी स्थान पर क्यों रखी गई है?

यह प्रश्न आगे 3.5 में अधिक विस्तार से आएगा।

महाभारत की “आवाज़ें”

महाभारत में एक ही लेखक की एकल आवाज सुनाई नहीं देती।

वहाँ अनेक आवाजें हैं— व्यास की, संजय की,  कृष्ण की, अर्जुन की, भीष्म की, विदुर की, द्रौपदी की, युधिष्ठिर की,

और असंख्य अन्य पात्रों की। इनमें से प्रत्येक अपनी परिस्थिति और दृष्टि से बोलता है।

इसीलिए महाभारत का अर्थ किसी एक पात्र की वाणी में बंद नहीं किया जा सकता।

यह— बहुवाणी वाला ग्रंथ है।

बहुवाणी और बहुअर्थ

जब अनेक पात्र बोलते हैं, तो एक ही नैतिक प्रश्न के अनेक रूप सामने आते हैं।

किसी के लिए धर्म एक बात है। 

दूसरे के लिए वही परिस्थिति दूसरी माँग करती है।

किसी का सत्य दूसरे के लिए संकट बन सकता है।

किसी का कर्तव्य दूसरे के अधिकार से टकरा सकता है।

महाभारत इन मतभेदों को हमेशा तुरंत समाप्त नहीं करता।

वह उन्हें साथ रखता है। इससे पाठक को निर्णय के लिए विवेक का उपयोग करना पड़ता है।

लेकिन इस भाग का हमारा उद्देश्य धर्म की अंतिम व्याख्या करना नहीं।

यहाँ केवल इतना देखना पर्याप्त है कि— बहुस्तरीय कथन महाभारत में बहुविध दृष्टिकोणों के लिए स्थान बनाता है।

कथन की परतें और पाठक

महाभारत का पाठक भी इस संरचना का अंतिम स्तर बन जाता है।

अब एक सरल श्रृंखला बनती है—

घटना

पात्र का अनुभव

किसी कथाकार का कथन

किसी अन्य श्रोता के सामने पुनर्कथन

पाठ-परंपरा

आज का पाठक

इस अंतिम बिंदु पर एक नई समस्या उत्पन्न होती है।

आज का पाठक इस पूरी परंपरा को एक लिखित ग्रंथ के रूप में पढ़ता है।

इसलिए उसे यह भूलना नहीं चाहिए कि उसके सामने केवल घटनाएँ नहीं हैं।

उसके सामने— घटनाओं की स्मृति और उनके कथन की परंपरा भी है।

महाभारत को पढ़ने की एक नई पद्धति

इस संरचना को समझने के बाद महाभारत पढ़ने की हमारी पद्धति बदलनी चाहिए।

किसी भी महत्वपूर्ण प्रसंग पर कम-से-कम चार प्रश्न पूछे जा सकते हैं—

1. घटना क्या है? - क्या कहा या किया जा रहा है?

2. वक्ता कौन है? - कौन यह बात कह रहा है?

3. श्रोता कौन है? - किसे कही जा रही है?

4. प्रसंग क्या है? - इस समय यह बात कहने की आवश्यकता क्यों उत्पन्न हुई?

इन चार प्रश्नों से कथा का अर्थ अक्सर अधिक स्पष्ट हो जाता है।

बहुस्तरीय संरचना का अंतिम अर्थ

महाभारत में कथा केवल अतीत की घटनाओं का भंडार नहीं।

वह अतीत को बार-बार वर्तमान प्रश्नों के सामने प्रस्तुत करने की विधि भी है।

एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी से पूछती है।

एक राजा किसी पुराने राजा की कथा सुनता है।

एक योद्धा किसी ऋषि से प्रश्न करता है।

एक शिष्य गुरु से ज्ञान ग्रहण करता है।

एक अंधा राजा अपने सारथी से युद्ध का दृश्य सुनता है।

और आज का पाठक उन सभी आवाजों को पढ़ता है।

इस प्रकार महाभारत में— कथा समय के पार संवाद बन जाती है।

निष्कर्ष

महाभारत की कथा-संरचना को समझने के लिए केवल कथाओं की संख्या गिनना पर्याप्त नहीं।

महत्वपूर्ण यह है कि— एक कथा किसके द्वारा, किससे, किस प्रसंग में और किस पूर्वकथा के आधार पर कही जा रही है।

उग्रश्रवा सौति और शौनक का प्रसंग बाहरी कथन-फ्रेम देता है।

जनमेजय और वैशम्पायन की परंपरा उसके भीतर दूसरी परत बनाती है।

व्यास की उपस्थिति कथाकार और पात्र के बीच की सीमा को जटिल बनाती है।

संजय का कथन युद्ध को एक विशिष्ट दृष्टि से हमारे सामने लाता है।

और कृष्ण-अर्जुन संवाद उसी बहुस्तरीय संरचना के भीतर दार्शनिक अर्थ ग्रहण करता है।

इसलिए महाभारत को पढ़ते समय हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए— “क्या कहा गया?”

बल्कि— “किसने कहा, किससे कहा, कब कहा और क्यों कहा?”

यही प्रश्न हमें महाभारत की कथात्मक वास्तुकला के भीतर ले जाता है।

और इसके बाद अगला स्वाभाविक प्रश्न है—

जब महाभारत में इतने सारे वक्ता और श्रोता हैं, तो क्या उनका दृष्टिकोण भी कथा के अर्थ को बदलता है?

यहीं से अगला भाग आरंभ होगा—

3.3 — वक्ता, श्रोता और प्रसंग : कथा का अर्थ कैसे बनता है?

इस भाग में हम कथा-परतों की पुनरावृत्ति नहीं करेंगे; अब विशेष रूप से वक्ता की स्थिति, श्रोता की स्थिति और कथन के प्रसंग का अर्थ-निर्माण पर प्रभाव देखेंगे।

— मुकेश श्रीवास्तव

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