महाभारत - अध्याय 3.1 एक कथा नहीं, कथाओं का महाजाल

अध्याय 3.1

एक कथा नहीं, कथाओं का महाजाल

महाभारत को पहली दृष्टि में देखें तो वह एक कथा प्रतीत होता है—कुरुवंश, पांडव, कौरव और अंततः कुरुक्षेत्र का युद्ध।

लेकिन जैसे-जैसे हम ग्रंथ के भीतर प्रवेश करते हैं, यह सरल चित्र टूटने लगता है।

कुरुक्षेत्र का युद्ध एक कथा है। उसके पीछे कुरुवंश की कथा है।

कुरुवंश के पीछे भरत और पुरुवंश की परंपराएँ हैं।

युद्ध के भीतर असंख्य पात्रों की अपनी-अपनी कथाएँ हैं।

और मुख्य कथा के बीच ऐसे प्रसंग आते हैं जिनका संबंध तत्कालीन युद्ध से प्रत्यक्ष नहीं दिखाई देता—नल और दमयंती, सावित्री, रामोपाख्यान, ययाति, शकुंतला, अंबा, रुरु, मत्स्य, गरुड़ आदि अनेक आख्यान।

इसलिए महाभारत को केवल— “पांडवों और कौरवों की कहानी” कहना उसके वास्तविक स्वरूप को अत्यधिक छोटा कर देना है।

महाभारत का अधिक उपयुक्त रूपक है— एक कथा के भीतर विकसित होता हुआ कथाओं का विशाल संसार।

केंद्रीय कथा और उसके चारों ओर का संसार

महाभारत में एक स्पष्ट केंद्रीय कथा है।

कुरुवंश में उत्पन्न संघर्ष धीरे-धीरे पांडवों और कौरवों के संघर्ष में बदलता है और अंततः कुरुक्षेत्र के युद्ध तक पहुँचता है।

यदि हम केवल इस धुरी को लें, तो कथा का एक मोटा क्रम बनता है—

वंश → जन्म → संघर्ष → वनवास → राजनीतिक प्रयास → युद्ध → विनाश → उत्तरजीवन।

लेकिन महाभारत इसी धुरी पर रुकता नहीं। 

हर बड़े प्रसंग के आसपास दूसरी कथाएँ खुलती हैं।

किसी पात्र के प्रश्न के उत्तर में कोई पुरानी कथा कही जाती है।

किसी नैतिक समस्या को समझाने के लिए किसी पूर्व राजा की कथा सामने आती है।

किसी संकटग्रस्त व्यक्ति को सांत्वना देने के लिए किसी समान संकट की कथा सुनाई जाती है।

किसी दार्शनिक प्रश्न को स्पष्ट करने के लिए संवाद या आख्यान प्रस्तुत होता है।

इस प्रकार— मुख्य कथा दूसरी कथाओं को जन्म देती है और दूसरी कथाएँ मुख्य कथा को अर्थ देती हैं।

यही महाभारत की विशिष्ट रचना-शक्ति है।

कथा के भीतर दूसरी कथा क्यों?

यह प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण है।

यदि महाभारत केवल युद्ध की कहानी कहना चाहता, तो नल-दमयंती जैसी कथा को युधिष्ठिर के सामने कहने की आवश्यकता क्यों पड़ती?

यदि उद्देश्य केवल घटनाओं का क्रम देना होता, तो सावित्री की कथा क्यों आती?

यदि लक्ष्य केवल कुरुवंश का इतिहास होता, तो इतने प्राचीन राजाओं और ऋषियों की कथाएँ क्यों समाहित की जातीं?

इसका उत्तर यह है कि महाभारत में कथा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं।

कथा— अनुभव को समझने का माध्यम है। युधिष्ठिर संकट में है।

उसे किसी सिद्धांत का उपदेश देने के बजाय उसके समान संकट से गुजरे किसी व्यक्ति की कथा सुनाई जाती है।

इस प्रकार सिद्धांत जीवन की घटना बन जाता है।

उपदेश के स्थान पर उदाहरण

महाभारत की एक महत्वपूर्ण पद्धति यह है कि वह अनेक बार सीधे यह नहीं कहता— “ऐसा करो।”

वह पहले किसी व्यक्ति की कथा सुनाता है। फिर पाठक देखता है कि उस व्यक्ति ने क्या किया।

उसका परिणाम क्या हुआ। उसके सामने कौन-सा द्वंद्व था।

और उसके निर्णय ने उसके जीवन को किस दिशा में पहुँचाया।

इससे पाठक केवल नियम नहीं सीखता। वह— निर्णय की जटिलता का अनुभव करता है।

यही कारण है कि महाभारत की कथाएँ केवल मुख्य कथा से बाहर निकली हुई “अतिरिक्त कहानियाँ” नहीं हैं।

वे मुख्य कथा के प्रश्नों को दूसरी परिस्थितियों में पुनः उपस्थित करती हैं।

नल-दमयंती : एक उदाहरण

वनवास के समय युधिष्ठिर अत्यंत कठिन स्थिति में है। 

उसकी दृष्टि में उसका दुर्भाग्य असह्य है।

ऐसे समय नल-दमयंती की कथा सुनाई जाती है।

नल भी राज्य खोता है। वह भी संकट में पड़ता है। वह भी अपने जीवन में विघटन का अनुभव करता है।

लेकिन नल की कथा युधिष्ठिर की कथा की प्रतिलिपि नहीं। वह एक दर्पण है।

युधिष्ठिर अपनी परिस्थिति को दूसरी कथा के माध्यम से देख सकता है।

यही उपाख्यान का कार्य है। 

वह मुख्य कथा को रोकता हुआ प्रतीत होता है, लेकिन वास्तव में— वह मुख्य पात्र की समस्या को दूसरी रोशनी में दिखाता है।

सावित्री : मृत्यु के सामने मनुष्य

सावित्री की कथा भी मुख्य कुरु-कथा का प्रत्यक्ष भाग नहीं।

फिर भी वह महाभारत में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण करती है।

उसके केंद्र में विवाह, निष्ठा, मृत्यु और मानवीय संकल्प के प्रश्न हैं।

यम और सावित्री का संवाद जीवन और मृत्यु के बीच एक दार्शनिक तनाव पैदा करता है।

इस कथा का महत्व केवल सावित्री के चरित्र में नहीं। 

यह भी महत्वपूर्ण है कि महाभारत— मृत्यु के प्रश्न को एक स्वतंत्र कथा के माध्यम से मुख्य आख्यान के भीतर लाता है।

इस प्रकार एक उपाख्यान मुख्य कथा की विषयगत सीमा को विस्तृत कर देता है।

कथा का विस्तार : व्यक्ति से समाज तक

मुख्य कथा में राजा और योद्धा हैं।

लेकिन उपाख्यानों के माध्यम से महाभारत का संसार और व्यापक हो जाता है।

उसमें— ऋषि हैं, स्त्रियाँ हैं, व्यापारी हैं, तपस्वी हैं, वनवासी हैं, देवता हैं, नाग हैं, पक्षी हैं, साधारण मनुष्य हैं।

इससे महाभारत का अनुभव केवल राजवंश का अनुभव नहीं रह जाता।

राजसत्ता के प्रश्न के साथ— परिवार, विवाह, तप, व्रत, मृत्यु, इच्छा, लोभ, करुणा, सत्य, कर्तव्य जैसे अनेक मानवीय अनुभव भी कथा का हिस्सा बन जाते हैं।

एक कथा दूसरे को कैसे अर्थ देती है?

महाभारत की रचना को समझने के लिए यह सूत्र उपयोगी है— 

मुख्य कथा प्रश्न देती है; उपकथा उसका दूसरा मानवीय रूप प्रस्तुत करती है।

युधिष्ठिर का संकट एक प्रश्न है।  

नल की कथा उसका एक समानांतर रूप प्रस्तुत करती है।

मृत्यु का भय एक प्रश्न है।

सावित्री उसका दूसरा रूप प्रस्तुत करती है।

राजधर्म एक प्रश्न है।

पुराने राजाओं की कथाएँ उसके अनेक उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।

इसलिए महाभारत में कथा और उपकथा का संबंध सजावटी नहीं।

यह— विचार को अनुभव में बदलने की विधि है।

कथा-संसार का विस्तार

महाभारत की कथाएँ एक वृक्ष की तरह फैलती हैं।

एक मुख्य तना है। उससे शाखाएँ निकलती हैं। फिर शाखाओं से उपशाखाएँ।

और कई बार किसी उपशाखा से ऐसी कथा खुलती है जिसका अपना स्वतंत्र संसार है।

लेकिन ये शाखाएँ पूरी तरह अलग भी नहीं।

उनका संबंध किसी न किसी प्रश्न, पात्र या प्रसंग से जुड़ा रहता है।

इसलिए महाभारत को एक कथात्मक वृक्ष की तरह देखा जा सकता है।

लेकिन यह वृक्ष नियमित ज्यामितीय संरचना वाला नहीं। 

यह जीवित परंपरा की तरह बढ़ता है।

कथा की बहुलता और अर्थ की बहुलता

कथाएँ बढ़ती हैं तो अर्थ भी बढ़ते हैं।

यदि महाभारत में केवल पांडव-कौरव संघर्ष होता, तो उसका नैतिक अर्थ भी अपेक्षाकृत सीमित रहता।

लेकिन जब उसी ग्रंथ में अनेक जीवन-कथाएँ आती हैं, तो पाठक को एक ही प्रश्न के अनेक उत्तर दिखाई देते हैं।

उदाहरण के लिए— धर्म क्या है?

किसी एक कथा में धर्म सत्य हो सकता है।

दूसरी कथा में सत्य और धर्म के बीच तनाव दिखाई दे सकता है।

कहीं वचन पालन धर्म है।

कहीं वचन स्वयं संकट बन जाता है।

कहीं परिवार का दायित्व प्रधान है।

कहीं व्यक्तिगत नैतिकता उसके विरुद्ध खड़ी होती है।

इस प्रकार महाभारत किसी प्रश्न को एक उत्तर देकर समाप्त नहीं करता।

वह उसे— जीवन की अनेक परिस्थितियों में पुनः उपस्थित करता है।

पुनरावृत्ति या पुनर्परीक्षण?

यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर है।

महाभारत में कुछ विषय बार-बार आते हैं।

पहली दृष्टि में यह दोहराव लग सकता है।

लेकिन हर बार परिस्थिति बदल जाती है।

इसलिए वही प्रश्न नया रूप ग्रहण करता है।

उदाहरण के लिए— सत्य क्या है?

यह प्रश्न किसी राजा के सामने अलग है। किसी योद्धा के सामने अलग।

किसी स्त्री के सामने अलग। किसी ऋषि के सामने अलग।

किसी मृत्यु-संकट में पड़े व्यक्ति के सामने अलग।

इसलिए महाभारत की बहुलता को केवल repetition कहना उचित नहीं।

यह अनेक परिस्थितियों में— एक ही मानवीय प्रश्न का पुनर्परीक्षण भी है।

कथा और पात्र का विस्तार

मुख्य कथा के अनेक पात्रों का परिचय भी दूसरी कथाओं के माध्यम से होता है।

किसी पात्र का वर्तमान निर्णय उसके अतीत से जुड़ा होता है।

किसी पात्र का स्वभाव उसके पूर्व अनुभव से समझ में आता है।

किसी वंश का वर्तमान उसके पूर्वजों की कथा के बिना अधूरा है।

इससे पात्र केवल वर्तमान क्षण के अभिनेता नहीं रहते। वे— स्मृति से निर्मित व्यक्तित्व बन जाते हैं।

यही कारण है कि महाभारत में चरित्र-चित्रण केवल वर्तमान घटनाओं के माध्यम से नहीं होता।

कथा पीछे जाती है। पूर्वकथा सामने आती है। और पात्र का अर्थ बदल जाता है।

महाभारत की कथा-प्रणाली का एक महत्वपूर्ण परिणाम

इस संरचना का सबसे बड़ा परिणाम यह है कि महाभारत को एक ही स्तर पर पढ़ना कठिन हो जाता है।

यदि हम केवल मुख्य युद्ध-कथा पढ़ें, तो हमें एक राजनीतिक महागाथा दिखाई देती है।

यदि हम उपाख्यानों को देखें, तो मानव-जीवन का विशाल संसार सामने आता है।

यदि हम संवादों को देखें, तो दार्शनिक और नैतिक विमर्श सामने आता है।

यदि हम वंशकथाओं को देखें, तो दीर्घ स्मृति सामने आती है।

और यदि हम इन सभी को साथ देखें, तो महाभारत एक— बहुस्तरीय ज्ञान-परंपरा के रूप में दिखाई देता है।

“महाजाल” शब्द का अर्थ

यहाँ “महाजाल” का अर्थ अव्यवस्थित या बिखरा हुआ नहीं है। जाल में अनेक बिंदु होते हैं।

एक बिंदु दूसरे से जुड़ा होता है। 

महाभारत की कथाएँ भी इसी प्रकार एक-दूसरे से जुड़ती हैं।

कभी पात्र के माध्यम से। कभी प्रश्न के माध्यम से।

कभी समान परिस्थिति के माध्यम से। कभी विरोध के माध्यम से।

कभी स्मृति के माध्यम से। 

इसलिए उसकी विशालता केवल सामग्री की मात्रा नहीं। उसकी वास्तविक जटिलता है— इन कथाओं के पारस्परिक संबंध।

पाठक की भूमिका

ऐसी रचना पाठक से भी एक विशेष प्रकार की सक्रियता माँगती है।

सरल कथा में पाठक घटनाओं का अनुसरण करता है— फिर यह हुआ, फिर वह हुआ।

महाभारत में पाठक को कभी-कभी रुककर पूछना पड़ता है— 

यह कथा यहाँ क्यों आई? यह पात्र अभी क्यों याद किया गया? इस पुराने आख्यान का वर्तमान परिस्थिति से क्या संबंध है? इस कथा से मुख्य पात्र की समस्या कैसे बदलकर दिखाई दे रही है?

इस प्रकार महाभारत पाठक को केवल कहानी सुनने वाला नहीं रहने देता।

वह उसे— अर्थ की खोज करने वाला पाठक बना देता है।

यही कारण है कि महाभारत को “पढ़ना” कठिन है

महाभारत की कठिनाई केवल उसके आकार में नहीं। उसकी कठिनाई उसकी संरचना में है।

एक कथा दूसरी कथा की ओर ले जाती है। एक पात्र दूसरे पात्र के अतीत की ओर।

एक संवाद किसी पुराने आख्यान की ओर। एक प्रश्न दूसरे प्रश्न की ओर।

इसलिए महाभारत को केवल घटनाओं की सूची की तरह पढ़ना उसके अर्थ को नष्ट कर सकता है।

हमें कथा के भीतर— कथा का कार्य देखना होगा।

एक सावधानी : हर उपाख्यान को “मूल कथा से बाहर” न मानें

यह कहना भी उचित नहीं होगा कि मुख्य कथा ही असली महाभारत है और बाकी सब बाद में जोड़ी गई अनावश्यक सामग्री है।

ऐसा निष्कर्ष बिना पाठीय प्रमाण के नहीं निकाला जा सकता।

क्योंकि महाभारत की रचना-पद्धति में उपाख्यानों का समावेश स्वयं उसकी संरचनात्मक विशेषता बन चुका है।

इसलिए प्रत्येक कथा को पहले यह पूछकर देखना चाहिए—  

वह महाभारत के वर्तमान अर्थ-संसार में क्या कार्य कर रही है?

उसके बाद ही उसकी पाठीय प्राचीनता या विकास का प्रश्न उठाया जाना चाहिए।

मुख्य कथा और उपकथा का संबंध : अंतिम सूत्र

अब इस पूरे भाग को एक सूत्र में बाँधा जा सकता है— 

महाभारत में उपकथा मुख्य कथा से विचलन नहीं; मुख्य कथा के अर्थ का विस्तार है।

मुख्य कथा घटना दिखाती है। उपकथा अनुभव का दूसरा उदाहरण देती है।

संवाद प्रश्न को खोलता है। उपदेश उसका सिद्धांत प्रस्तुत करता है।

और इन सबके मेल से महाभारत का व्यापक अर्थ-संसार बनता है।

निष्कर्ष

महाभारत को केवल कुरुक्षेत्र के युद्ध की कथा कहना वैसा ही है जैसे किसी विशाल वृक्ष को उसकी एक शाखा से पहचानना।

उसका केंद्र कुरु-पांडव संघर्ष अवश्य है, लेकिन उसका कथात्मक संसार उससे बहुत बड़ा है।

उसमें अनेक कथाएँ हैं। लेकिन वे केवल बिखरी हुई कहानियाँ नहीं।

वे मुख्य कथा के प्रश्नों को अलग-अलग जीवन-स्थितियों में पुनः उपस्थित करती हैं।

नल युधिष्ठिर के संकट को दूसरी दृष्टि देता है। सावित्री मृत्यु के प्रश्न को दूसरी भूमि पर ले जाती है।

पुराने राजाओं की कथाएँ सत्ता और धर्म के प्रश्नों को विस्तृत करती हैं।

ऋषि-कथाएँ मनुष्य और तप के संबंध को खोलती हैं।

इस प्रकार महाभारत की कथात्मक बहुलता उसकी कमजोरी नहीं, उसकी रचना-पद्धति का मूल तत्व है।

इसलिए महाभारत को समझने की पहली संरचनात्मक दृष्टि यह होनी चाहिए— 

इसे केवल एक कथा के रूप में नहीं, बल्कि परस्पर संबद्ध कथाओं के एक विशाल तंत्र के रूप में पढ़ा जाए।

और यहीं से अगला प्रश्न स्वाभाविक रूप से जन्म लेता है— 

यदि महाभारत अनेक कथाओं से बना है, तो ये कथाएँ एक-दूसरे के भीतर प्रवेश कैसे करती हैं? कौन किसे कथा सुनाता है? और पाठक को एक कथा से दूसरी कथा तक कौन ले जाता है?

यही हमारा अगला भाग होगा—

3.2 — कथा के भीतर कथा : आख्यान की बहुस्तरीय संरचना

यहाँ हम पहली बार महाभारत की कथन-परतों—कौन बोल रहा है, किसे बोल रहा है, किसके द्वारा सुनी हुई कथा आगे कही जा रही है—का विश्लेषण करेंगे।

— मुकेश श्रीवास्तव

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