महाभारत - आदिपर्व — एकलव्य : ज्ञान, अधिकार और व्यवस्था की सीमा
आदिपर्व — एकलव्य : ज्ञान, अधिकार और व्यवस्था की सीमा पाण्डवों और कौरवों की शिक्षा के प्रसंग में एकलव्य की कथा बहुत छोटी है, लेकिन उसका प्रश्न अत्यंत बड़ा है। इसे केवल द्रोणाचार्य द्वारा अंगूठा माँग लेने की कथा मानना इसके दार्शनिक और सामाजिक अर्थ को सीमित कर देगा। यहाँ हमारा प्रश्न है— क्या प्रतिभा और ज्ञान पर सामाजिक व्यवस्था का अधिकार हो सकता है? कथा : एकलव्य कौन था? एकलव्य निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र बताया गया है। वह धनुर्विद्या सीखना चाहता था और द्रोणाचार्य को अपना गुरु बनाना चाहता था। वह द्रोण के पास पहुँचा। लेकिन द्रोण ने उसे शिष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया। एकलव्य वापस गया। उसने द्रोण की एक मूर्ति बनाई और उसे गुरु मानकर स्वयं अभ्यास करने लगा। अभ्यास इतना कठोर था कि वह असाधारण धनुर्धर बन गया। एक दिन कौरव-पाण्डव वन में गए। वहाँ एक कुत्ते का मुँह बाणों से इस प्रकार बंद कर दिया गया था कि उसे चोट नहीं लगी थी, लेकिन वह भौंक भी नहीं सकता था। राजकुमारों ने उस अद्भुत कौशल को देखा। जब द्रोण को पता चला कि यह कार्य एकलव्य ने किया है, तो अर्जुन को चिंता हुई। द्रोण ने उसे याद ...