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Saturday, 28 February 2026

दरवाज़े पर एक साया

 दरवाज़े पर एक साया

शाम ढल रही थी,
कमरे में रोशनी और अँधेरे की बराबर हिस्सेदारी थी,
और तभी
दरवाज़े पर एक साया ठहर गया।

न दस्तक,
न नाम,
बस मौजूदगी—
जैसे कोई बीता हुआ वक़्त
अपनी आहट खुद लेकर आया हो।

मैंने परदे की ओट से देखा—
चेहरा बदला हुआ था,
आँखें नहीं।
उनमें अब भी वही अधूरा सवाल था
जिसका जवाब हमने कभी पूरा नहीं दिया।

साया भीतर नहीं आया,
बस चौखट पर खड़ा रहा—
जैसे इंतज़ार कर रहा हो
कि मैं उसे पहचानूँ
या फिर अनदेखा कर दूँ।

मैंने दरवाज़ा खोला नहीं,
पर दिल की कुंडी
हल्की-सी हिल गई।

शायद वह तुम थे,
शायद मेरी अपनी ही याद—
जो इतने बरस बाद
दरवाज़े पर साया बनकर लौट आई थी।

— मुकेश

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