अगर मैं वैसा न रहूँ
मान लो
किसी सांझ
जब धूप आख़िरी बार
दीवारों को छूकर लौट रही हो,
और तुम अपने कमरे की खामोशी में
धीरे-धीरे घुल रही हो,
मैं आ जाऊँ
बिना दस्तक,
बिना किसी पुराने वादे की गूँज के।
चेहरे पर समय की हल्की-सी रेखाएँ हों,
आँखों में अब आग्रह नहीं,
सिर्फ़ ठहरा हुआ पानी हो।
बातें कम,
सुनना ज़्यादा,
और उम्मीदें लगभग शून्य।
मैं तुम्हें समझाने न आऊँ,
न मनाने,
न ही बीते दिनों की राख कुरेदने
बस चुपचाप बैठ जाऊँ
तुम्हारे सामने
जैसे कोई पुराना दरख़्त
आँधी के बाद भी खड़ा रहता है।
अगर मैं
प्रेम का इज़हार छोड़ चुका होऊँ,
और सिर्फ़ उपस्थिति बची हो,
तो क्या तुम
मेरी बदली हुई चाल में
वही पुराना नाम सुन पाओगी?
क्या तुम्हारी स्मृतियों की धूल
मेरे चेहरे से हटकर
फिर से मुझे पहचान लेगी?
जिसे तुम भुलाना भी चाहती हो,
और पूरी तरह खोना भी नहीं
क्या वो अब भी
मैं हूँ?
बताओ
अगर मैं कम हो जाऊँ
अपने ही भीतर,
तो क्या तुम्हारे दिल में
मेरी जगह
अब भी पूरी रहेगी?
— मुकेश
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