क्या तुम पहचानोगी?
क्या तुम पहचानोगी?
मान लो
गर्मी की एक उनींदी दोपहर में
ए.सी. की ठंडी साँसों के बीच
तुम किसी मीठे ख़्वाब में डूबी हो,
और मैं अचानक दरवाज़े पर आ खड़ा होऊँ।
फ्रेंच-कट दाढ़ी अब न हो,
बालों की बनावट बदल गई हो,
बातों का शोर छूट गया हो पीछे,
और मैं पहले से कम बोलने वाला,
ज़्यादा सुनने वाला हो गया होऊँ।
न कोई सलाह,
न कोई शिकवा,
न प्रेम का दावा
बस स्थिर-सी नज़रें
और थोड़े बेतरतीब कपड़े,
जैसे भीतर का मौसम
बाहर उतर आया हो।
मान लो
मैं “मैं” कम रह गया होऊँ,
और एक ख़ामोश आईना ज़्यादा।
तो क्या तुम
मेरी आवाज़ के बिना
मेरी ख़ामोशी से मुझे पहचानोगी?
क्या तुम्हारी पलकों पर
अब भी मेरा नाम
हल्की-सी थरथराहट बनकर उतरता है?
जिससे तुम पीछा छुड़ाना भी चाहती हो,
और पूरी तरह छोड़ भी नहीं पाती
क्या वो अब भी मैं हूँ?
बोलो
अगर मैं बदल जाऊँ इतना
कि पहचान में न आऊँ,
तो क्या तुम्हारा दिल
मुझे फिर भी
मुकेश कहेगा?
— मुकेश
Comments
Post a Comment