ग़ैरज़रूरी बातें
मुझे तुम्हारे बारे में
बहुत-सी ग़ैरज़रूरी बातें मालूम हैं—
तुम चाय में कितनी शक्कर डालती हो,
बरसात में बाल खुला रखना क्यों पसंद है,
और किताब के पन्ने मोड़ने से
क्यों चिढ़ जाती हो।
मुझे पता है
तुम किस रास्ते से रोज़ लौटती हो,
किस मोड़ पर रुककर साँस लेती हो,
और किस दुकान की बत्तियाँ
तुम्हें बेवजह उदास कर देती हैं।
ये भी जानता हूँ
कि तुम हँसते हुए अक्सर
आँखें क्यों चुरा लेती हो,
और ख़ामोशी में
किसका नाम
सबसे पहले टूटता है।
ये सारी बातें
तुम्हारे काम की नहीं,
मेरे भी किसी काम की नहीं—
बस इतनी-सी अहमियत है
कि इनके बिना
मैं तुम्हें
थोड़ा-सा भी
पूरा नहीं समझ पाता।
और शायद
इसीलिए
ये सारी बातें
ग़ैरज़रूरी होकर भी
मेरे लिए
सबसे ज़रूरी हैं
(अंचित् की कविता से प्रेरित हो के)
मुकेश्,,,
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