“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
इंतज़ार की ऋतुएँ
तुम जनवरी में नहीं आईं,
फरवरी भी खामोशी में बीती।
मार्च ने अपना उजाला फैला दिया,
और उम्मीद अब भी धड़कती है—
तुम आओगी, जैसे फागुन हर साल आता है,
बिना शोर, बिना आग्रह, बस अपनी मधुरता के साथ।
मुकेश ,,
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