ओस और खामोशी
जब जनवरी की आख़िरी हवा में
चाँद ने अपना सफ़ेद दर्पण फैलाया,
मैं जमीन की तरह शांत पड़ा था,
तुमने धीरे-धीरे मुझे अपनी छाया में रखा,
जैसे कोई फूल अपने पंखुड़ियों को ओस में भीगा रहा हो।
उस ठंडी नमी में छुपी तुम्हारी खुशबू
मेरी नसों में उतर गई,
मेरे अंदर के उन अनकहे हिस्सों तक,
जहाँ शब्द भी डरते हैं जाने से।
मैं कैसे भूल सकता हूँ
उस रात की हर मुस्कान को,
हर धीमे स्पर्श को,
जो ओस की तरह मेरे भीतर घुल गया था।
और आज भी,
जब चाँद हवा में झिलमिलाता है,
मैं सिर्फ खामोश बैठा हूँ
तुम्हारे बिना भी तुम्हें महसूस करते हुए।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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