फरवरी की बेरुखी

 फरवरी की बेरुखी


फरवरी का महीना

हल्की होती ठंड, धूप की झिलमिलाहट,

और तुम्हारी वही बेरुखी,

जो सर्दी के मौसम में भी मेरे भीतर गूँजती थी।


हवा के झोंके मुझे तुम्हारी याद दिलाते हैं,

हर पत्ता, हर सर्द कुहासा,

एक अधूरी बातें, एक अधूरी मुस्कान को छूता है।


मैं देखता हूँ तुम्हें,

तुम्हारी चुप्पी में, तुम्हारे नजरों की दूरी में,

और समझता हूँ

सर्दियों की ठंड नहीं, तुम्हारी बेरुखी ही मेरे भीतर का सन्नाटा है।


फरवरी की हल्की ठंड में,

तुम्हारे बिना, मैं सिर्फ खामोशियों का एक राहगीर हूँ,

जो हर कदम पर तुम्हें ढूँढता है,

हर सांस में तुम्हें महसूस करता है।


मुकेश ,,,,,,,,

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