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Showing posts from October, 2026

महाभारत — मौसलपर्व - भाग ८ : द्वारका से हस्तिनापुर तक

महाभारत — मौसलपर्व - भाग ८ : द्वारका से हस्तिनापुर तक द्वारका पीछे छूट चुकी थी। समुद्र अपने भीतर उस नगर को समेट रहा था, जिसने कभी यादव शक्ति, कृष्ण की राजनीति और समुद्रपारीय समृद्धि का केंद्र बनकर इतिहास और आख्यान—दोनों में अपना स्थान बनाया था। अर्जुन के सामने अब कोई युद्ध नहीं था। उसके सामने केवल लौटने की यात्रा थी। लेकिन यह वापसी साधारण नहीं थी। उसके साथ वे स्त्रियाँ, बच्चे और वृद्ध थे जो यादव-विनाश के बाद जीवित बचे थे। उनके लिए द्वारका केवल एक नगर नहीं, उनका घर था; अर्जुन के लिए वह कृष्ण की स्मृति थी। मार्ग में जिन आक्रमणकारियों ने उनके समूह को घेरा था, उनसे संघर्ष के बाद अर्जुन ने पहली बार अपनी शक्ति की उस सीमा को स्वीकार किया जिसे वह स्वयं भी समझ नहीं पा रहा था। गांडीव उसके हाथ में था, पर वह पुराना अर्जुन उसके भीतर उसी रूप में उपस्थित नहीं था। महाभारत इस घटना को अत्यंत संक्षेप में रखता है, लेकिन उसका प्रभाव व्यापक है। कुरुक्षेत्र के बाद अर्जुन के पास विजय की स्मृति थी। अब उसके पास संरक्षण का दायित्व था। युद्ध में शत्रु को परास्त करना और असहाय लोगों को सुरक्षित रखना एक ही प्रकार की...

महाभारत — मौसलपर्व - भाग ७ : अर्जुन का आगमन और द्वारका का अंत

महाभारत — मौसलपर्व - भाग ७ : अर्जुन का आगमन और द्वारका का अंत कृष्ण के प्रस्थान के बाद द्वारका में अब कोई निर्णय लेने वाला नहीं था। दारुक हस्तिनापुर पहुँच चुका था और उसने अर्जुन को यादवों के विनाश, बलराम के प्रस्थान और कृष्ण की अंतिम अवस्था का समाचार दिया। यह समाचार अर्जुन के लिए केवल किसी प्रिय मित्र के खोने का समाचार नहीं था। उसके सामने कुरुक्षेत्र का वह समूचा संसार अचानक बदल गया था जिसमें कृष्ण उसके सारथी, मार्गदर्शक और मित्र के रूप में उपस्थित थे। अर्जुन तुरंत द्वारका की ओर चला। जिस कृष्ण के साथ उसने जीवन के सबसे निर्णायक क्षण बाँटे थे, अब उसी कृष्ण से उसका अंतिम मिलन भी नहीं हो सकता था। द्वारका पहुँचने पर अर्जुन ने जो देखा, वह किसी विजयी नगर का दृश्य नहीं था। यादवों का महान वंश अपने ही संघर्ष में समाप्त हो चुका था। राजमहल, समुद्र और नगर की गलियाँ थीं, लेकिन उनके भीतर वह जीवन नहीं था जो कभी द्वारका की पहचान था। अर्जुन ने कृष्ण के अंतिम संस्कार का कार्य पूरा किया। बलराम और यादवों के मृत शरीरों का भी संस्कार कराया गया। अब उसके सामने अगला दायित्व था—बचे हुए लोगों को सुरक्षित निकालना। ...