महाभारत — मौसलपर्व - भाग ८ : द्वारका से हस्तिनापुर तक
महाभारत — मौसलपर्व - भाग ८ : द्वारका से हस्तिनापुर तक द्वारका पीछे छूट चुकी थी। समुद्र अपने भीतर उस नगर को समेट रहा था, जिसने कभी यादव शक्ति, कृष्ण की राजनीति और समुद्रपारीय समृद्धि का केंद्र बनकर इतिहास और आख्यान—दोनों में अपना स्थान बनाया था। अर्जुन के सामने अब कोई युद्ध नहीं था। उसके सामने केवल लौटने की यात्रा थी। लेकिन यह वापसी साधारण नहीं थी। उसके साथ वे स्त्रियाँ, बच्चे और वृद्ध थे जो यादव-विनाश के बाद जीवित बचे थे। उनके लिए द्वारका केवल एक नगर नहीं, उनका घर था; अर्जुन के लिए वह कृष्ण की स्मृति थी। मार्ग में जिन आक्रमणकारियों ने उनके समूह को घेरा था, उनसे संघर्ष के बाद अर्जुन ने पहली बार अपनी शक्ति की उस सीमा को स्वीकार किया जिसे वह स्वयं भी समझ नहीं पा रहा था। गांडीव उसके हाथ में था, पर वह पुराना अर्जुन उसके भीतर उसी रूप में उपस्थित नहीं था। महाभारत इस घटना को अत्यंत संक्षेप में रखता है, लेकिन उसका प्रभाव व्यापक है। कुरुक्षेत्र के बाद अर्जुन के पास विजय की स्मृति थी। अब उसके पास संरक्षण का दायित्व था। युद्ध में शत्रु को परास्त करना और असहाय लोगों को सुरक्षित रखना एक ही प्रकार की...