अध्याय–16 : आत्मनियंत्रण और इच्छाशक्ति
अध्याय–16 : आत्मनियंत्रण और इच्छाशक्ति मनुष्य अपने मन की तत्काल प्रवृत्तियों पर नियंत्रण कैसे विकसित करता है? मनुष्य अपने जीवन में अनेक ऐसे निर्णय करता है जिन्हें वह उचित मानता है, लेकिन व्यवहार में उनका पालन नहीं कर पाता। वह जानता है कि क्रोध करना उचित नहीं, फिर भी क्रोध कर बैठता है। वह समझता है कि समय का सदुपयोग करना चाहिए, फिर भी काम टालता रहता है। वह किसी पुरानी आदत को छोड़ने का निश्चय करता है, लेकिन कुछ समय बाद उसी आदत में लौट जाता है। ऐसी परिस्थितियों में मनुष्य प्रायः अपने विषय में एक निष्कर्ष निकाल लेता है—मेरी इच्छाशक्ति कमजोर है, मैं आत्मनियंत्रण नहीं कर सकता, मुझमें दृढ़ता की कमी है। लेकिन क्या आत्मनियंत्रण केवल इच्छाशक्ति का प्रश्न है? क्या मनुष्य अपने मन की इच्छाओं को दबाकर ही संतुलित जीवन जी सकता है? क्या अचेतन मन की पुरानी प्रवृत्तियों को बदलने के लिए केवल दृढ़ संकल्प पर्याप्त है? इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए आत्मनियंत्रण को केवल नैतिक गुण या इच्छाओं के दमन के रूप में नहीं, बल्कि एक मानसिक प्रक्रिया के रूप में समझना आवश्यक है। आत्मनियंत्रण क्या है? आत्मनियंत्रण...