अध्याय–16 : आत्मनियंत्रण और इच्छाशक्ति

 अध्याय–16 : आत्मनियंत्रण और इच्छाशक्ति

मनुष्य अपने मन की तत्काल प्रवृत्तियों पर नियंत्रण कैसे विकसित करता है?

मनुष्य अपने जीवन में अनेक ऐसे निर्णय करता है जिन्हें वह उचित मानता है, लेकिन व्यवहार में उनका पालन नहीं कर पाता। वह जानता है कि क्रोध करना उचित नहीं, फिर भी क्रोध कर बैठता है। वह समझता है कि समय का सदुपयोग करना चाहिए, फिर भी काम टालता रहता है। वह किसी पुरानी आदत को छोड़ने का निश्चय करता है, लेकिन कुछ समय बाद उसी आदत में लौट जाता है।

ऐसी परिस्थितियों में मनुष्य प्रायः अपने विषय में एक निष्कर्ष निकाल लेता है—मेरी इच्छाशक्ति कमजोर है, मैं आत्मनियंत्रण नहीं कर सकता, मुझमें दृढ़ता की कमी है।

लेकिन क्या आत्मनियंत्रण केवल इच्छाशक्ति का प्रश्न है? क्या मनुष्य अपने मन की इच्छाओं को दबाकर ही संतुलित जीवन जी सकता है? क्या अचेतन मन की पुरानी प्रवृत्तियों को बदलने के लिए केवल दृढ़ संकल्प पर्याप्त है?

इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए आत्मनियंत्रण को केवल नैतिक गुण या इच्छाओं के दमन के रूप में नहीं, बल्कि एक मानसिक प्रक्रिया के रूप में समझना आवश्यक है।

आत्मनियंत्रण क्या है?

आत्मनियंत्रण वह मानसिक क्षमता है जिसके माध्यम से व्यक्ति अपनी इच्छाओं, भावनाओं, आवेगों और व्यवहार को परिस्थितियों तथा दीर्घकालीन उद्देश्यों के अनुरूप दिशा देने का प्रयास करता है।

आत्मनियंत्रण का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य के भीतर क्रोध, भय, लोभ, आकर्षण या इच्छा उत्पन्न ही न हो। इन भावनाओं का उत्पन्न होना मानवीय मानसिक प्रक्रिया का स्वाभाविक भाग है।

आत्मनियंत्रण का वास्तविक अर्थ यह है कि किसी भावना के उत्पन्न होने के बाद भी व्यक्ति उसके प्रभाव में आकर अनिवार्य रूप से वैसा व्यवहार न करे, जैसा उसका तत्काल आवेग चाहता है।

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को क्रोध आता है। वह अपमानजनक शब्द बोलना चाहता है। लेकिन वह अपने क्रोध को पहचानकर कुछ समय रुकता है और फिर परिस्थिति के अनुरूप अपनी बात कहता है।

यह आत्मनियंत्रण है।

इसमें भावना को समाप्त नहीं किया गया, बल्कि भावना और व्यवहार के बीच एक मानसिक अन्तर स्थापित किया गया है।

यही अन्तर मनुष्य को अपनी प्रतिक्रियाओं का सजग चयन करने की सम्भावना प्रदान करता है।

इच्छाशक्ति क्या है?

इच्छाशक्ति से आशय उस मानसिक क्षमता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति किसी उद्देश्य को स्वीकार करता है और बाधाओं के बावजूद उसकी दिशा में प्रयास जारी रखने का प्रयत्न करता है।

किसी व्यक्ति का यह निश्चय करना कि वह प्रतिदिन अध्ययन करेगा, नियमित व्यायाम करेगा, अपने क्रोध पर संयम रखेगा अथवा किसी हानिकारक आदत को छोड़ेगा—इच्छाशक्ति के उदाहरण हैं।

लेकिन इच्छाशक्ति और आत्मनियंत्रण एक ही चीज नहीं हैं।

इच्छाशक्ति किसी उद्देश्य की दिशा में प्रयास करने की क्षमता से सम्बन्धित है, जबकि आत्मनियंत्रण तत्काल उत्पन्न होने वाली प्रवृत्तियों और दीर्घकालीन उद्देश्य के बीच संतुलन स्थापित करने से सम्बन्धित है।

कभी-कभी व्यक्ति में किसी कार्य को करने की प्रबल इच्छा होती है, लेकिन वह आत्मनियंत्रण के अभाव में अपने व्यवहार को व्यवस्थित नहीं कर पाता। दूसरी ओर, कोई व्यक्ति किसी कार्य के प्रति विशेष उत्साह अनुभव किए बिना भी नियमित अभ्यास के माध्यम से उसे सम्पन्न कर सकता है।

इससे स्पष्ट होता है कि जीवन में सफलता केवल इच्छाशक्ति पर निर्भर नहीं होती। प्रेरणा, मानसिक स्थिति, आदतें, वातावरण और व्यवहार की व्यवस्था भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इच्छाशक्ति हमेशा समान क्यों नहीं रहती?

मनुष्य प्रायः यह अपेक्षा करता है कि यदि उसने कोई दृढ़ निश्चय कर लिया है, तो उसे हर परिस्थिति में उसी दृढ़ता के साथ उसका पालन करना चाहिए।

लेकिन वास्तविक जीवन में मानसिक क्षमता और व्यवहार की स्थिरता अनेक परिस्थितियों से प्रभावित होती है।

नींद की कमी, मानसिक तनाव, अत्यधिक थकान, भूख, भावनात्मक दबाव तथा लगातार अनेक कार्यों में उलझे रहना व्यक्ति के आत्मनियंत्रण को कठिन बना सकते हैं।

जब मनुष्य थका हुआ या तनावग्रस्त होता है, तब वह तत्काल आराम, मनोरंजन या राहत देने वाली गतिविधियों की ओर अधिक आकर्षित हो सकता है।

उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति दिनभर मानसिक श्रम करने के बाद शाम को अध्ययन करना चाहता है। लेकिन थकान के कारण वह अध्ययन के स्थान पर मोबाइल देखने लगता है।

यह आवश्यक नहीं कि उसके भीतर अध्ययन की इच्छा समाप्त हो गई हो। सम्भव है कि उस समय उसका मन तत्काल आराम को अधिक महत्त्व दे रहा हो।

इसलिए इच्छाशक्ति में कमी को हमेशा चरित्र की कमजोरी मानना उचित नहीं है।

कई बार व्यक्ति को अपने व्यवहार की व्यवस्था बदलने, पर्याप्त विश्राम करने और कार्य को सरल बनाने की आवश्यकता होती है।

आत्मनियंत्रण का वैज्ञानिक अध्ययन भी इस बात पर बल देता है कि व्यवहार केवल सचेत संकल्प से संचालित नहीं होता। मानसिक प्रक्रियाओं, भावनाओं, परिस्थितियों और स्वचालित प्रतिक्रियाओं का इसमें योगदान रहता है।

मस्तिष्क और आत्मनियंत्रण

आत्मनियंत्रण की प्रक्रिया में मस्तिष्क के अनेक क्षेत्र और तंत्र सम्मिलित होते हैं।

विशेष रूप से प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स अर्थात् मस्तिष्क के अग्रभाग का क्षेत्र लक्ष्य बनाए रखने, व्यवहार की योजना बनाने, ध्यान को व्यवस्थित करने और किसी तत्काल प्रतिक्रिया को रोकने जैसी प्रक्रियाओं में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

लेकिन आत्मनियंत्रण किसी एक मस्तिष्क क्षेत्र द्वारा संचालित सरल प्रक्रिया नहीं है। इसमें विभिन्न मानसिक और तंत्रिका प्रक्रियाओं का समन्वय होता है।

मनुष्य के भीतर एक ओर तत्काल सुख, राहत या आकर्षण प्राप्त करने की प्रवृत्ति हो सकती है, दूसरी ओर भविष्य के परिणामों को ध्यान में रखने की क्षमता भी होती है।

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को मिठाई खाने की इच्छा होती है। उसी समय वह यह भी जानता है कि उसे अपने स्वास्थ्य के लिए खानपान में संतुलन रखना चाहिए।

उसके व्यवहार का परिणाम इस बात पर निर्भर कर सकता है कि वह तत्काल इच्छा को किस प्रकार समझता है, अपने उद्देश्य को कितना स्पष्ट रखता है और परिस्थिति में कौन-से विकल्प उपलब्ध हैं।

यहाँ आत्मनियंत्रण का अर्थ इच्छा के विरुद्ध युद्ध करना नहीं, बल्कि अपनी मानसिक प्रक्रियाओं को उचित दिशा देना है।

आवेग और सजग प्रतिक्रिया के बीच अन्तर

मनुष्य की अनेक प्रतिक्रियाएँ इतनी शीघ्र उत्पन्न होती हैं कि उसे उनके बारे में सोचने का अवसर ही नहीं मिलता।

किसी व्यक्ति की बात से आहत होना, अचानक क्रोधित हो जाना, किसी वस्तु को देखकर उसे खरीदने की इच्छा उत्पन्न होना या मोबाइल की सूचना देखते ही उसे खोल लेना—ये सभी ऐसी परिस्थितियाँ हैं जिनमें आवेग व्यवहार को शीघ्र प्रभावित कर सकता है।

आवेग स्वयं में गलत नहीं है। वह कभी-कभी शीघ्र प्रतिक्रिया करने में सहायक भी होता है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब व्यक्ति प्रत्येक आवेग को आदेश मानकर उसका पालन करने लगता है।

आत्मनियंत्रण विकसित करने के लिए आवेग और व्यवहार के बीच एक छोटा-सा अन्तर स्थापित करना उपयोगी होता है।

इस अन्तर को विकसित करने के लिए तीन सरल कदम अपनाए जा सकते हैं।

पहला—पहचानना। अपने भीतर उत्पन्न इच्छा या भावना को पहचानिए। उदाहरण के लिए, “मुझे अभी क्रोध आ रहा है” या “मेरा मन इस समय काम छोड़कर मोबाइल देखने की इच्छा कर रहा है।”

दूसरा—रुकना। प्रतिक्रिया देने से पहले कुछ समय का विराम लीजिए। आवश्यकता हो तो धीरे-धीरे श्वास पर ध्यान दीजिए। इस विराम का उद्देश्य भावना को मिटाना नहीं, बल्कि तत्काल प्रतिक्रिया की अनिवार्यता को कम करना है।

तीसरा—चयन करना। अपने सामने उपलब्ध विकल्पों को देखिए और परिस्थिति के अनुरूप व्यवहार चुनिए।

यह प्रक्रिया अभ्यास के साथ अधिक सहज हो सकती है।

जब व्यक्ति अपने आवेग को पहचानने लगता है, तब वह धीरे-धीरे यह अनुभव करने लगता है कि इच्छा उत्पन्न होना और इच्छा के अनुसार व्यवहार करना दो अलग-अलग बातें हैं।

इच्छाओं को दबाना और उन्हें दिशा देना

आत्मनियंत्रण के विषय में एक सामान्य भ्रम यह है कि इच्छाओं को दबाना ही मानसिक अनुशासन है।

लेकिन किसी इच्छा को केवल दबाने का प्रयास करने से वह हमेशा समाप्त नहीं होती। कभी-कभी दबाई गई भावना किसी अन्य रूप में प्रकट हो सकती है या व्यक्ति के भीतर तनाव बढ़ा सकती है।

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को क्रोध आता है। वह अपने क्रोध को स्वीकार करने के बजाय यह मान लेता है कि क्रोध करना ही गलत है। वह बाहर से शांत दिखाई देता है, लेकिन भीतर लगातार तनाव अनुभव करता रहता है।

इसके विपरीत, यदि वह अपने क्रोध को पहचानता है, उसके कारण को समझता है और उसे उचित रूप से व्यक्त करना सीखता है, तो वह अधिक संतुलित व्यवहार विकसित कर सकता है।

इसी प्रकार, किसी इच्छा को समझना और उसके अनुसार व्यवहार करना अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं।

मनुष्य अपने भीतर उत्पन्न इच्छा को स्वीकार कर सकता है, लेकिन यह भी तय कर सकता है कि उस इच्छा की पूर्ति अभी आवश्यक नहीं है।

इस प्रकार आत्मनियंत्रण का आधार इच्छा का निषेध नहीं, बल्कि इच्छा के प्रति सजगता और विवेकपूर्ण व्यवहार है।

अचेतन मन और आत्मनियंत्रण

हमारी अनेक आदतें और प्रतिक्रियाएँ स्वतः संचालित होती हैं। इसलिए आत्मनियंत्रण का प्रश्न केवल उस समय उत्पन्न नहीं होता जब हम किसी इच्छा से संघर्ष कर रहे होते हैं। वह उन परिस्थितियों में भी महत्त्वपूर्ण होता है जहाँ हमारा व्यवहार बिना विशेष विचार के प्रारम्भ हो जाता है।

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति की आदत है कि वह काम करते समय बार-बार मोबाइल देखता है। उसे प्रत्येक बार मोबाइल देखने का निर्णय सचेत रूप से लेना आवश्यक नहीं होता। किसी संकेत, सूचना या थोड़े-से खाली समय में उसका हाथ स्वतः मोबाइल की ओर बढ़ सकता है।

यदि वह केवल इच्छाशक्ति के बल पर इस आदत को रोकने का प्रयास करता है, तो उसे बार-बार संघर्ष करना पड़ सकता है।

लेकिन यदि वह मोबाइल को अपने कार्यस्थल से दूर रखता है, अनावश्यक सूचनाएँ बन्द करता है और काम के लिए निश्चित समय निर्धारित करता है, तो उसके व्यवहार को बदलना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।

यहाँ आत्मनियंत्रण का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त सामने आता है—

अपने व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए केवल मन को मजबूत बनाना पर्याप्त नहीं; परिस्थितियों को भी इस प्रकार व्यवस्थित करना आवश्यक है कि उचित व्यवहार सहज और अनुचित व्यवहार कठिन हो जाए।

अचेतन मन की स्वतः सक्रिय होने वाली प्रवृत्तियों को नई दिशा देने में यह दृष्टिकोण विशेष उपयोगी है।

वातावरण का आत्मनियंत्रण पर प्रभाव

मनुष्य अक्सर अपने व्यवहार का श्रेय अपनी इच्छाशक्ति को देता है, जबकि उसके वातावरण का प्रभाव पर्याप्त महत्त्व रखता है।

यदि किसी व्यक्ति के सामने लगातार मोबाइल, मनोरंजन या अन्य आकर्षक वस्तुएँ उपलब्ध हों, तो उसका ध्यान बार-बार उनकी ओर जा सकता है।

यदि अध्ययन के लिए आवश्यक पुस्तकें, सामग्री और स्थान पहले से व्यवस्थित हों, तो अध्ययन आरम्भ करना सरल हो सकता है।

इसलिए आत्मनियंत्रण विकसित करने के लिए वातावरण में छोटे परिवर्तन उपयोगी हो सकते हैं।

उदाहरण के लिए—

  • अध्ययन के समय मोबाइल को दूसरे कमरे में रखना।

  • आवश्यक सामग्री पहले से तैयार रखना।

  • किसी विशेष कार्य के लिए निश्चित स्थान बनाना।

  • अनावश्यक आकर्षणों को कम करना।

  • उपयोगी व्यवहार को सरल और सहज बनाना।

इन उपायों का उद्देश्य मनुष्य की स्वतंत्रता को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसकी इच्छित गतिविधि को सहयोग देना है।

जब वातावरण अनुकूल होता है, तब व्यक्ति को प्रत्येक क्षण अपनी इच्छाशक्ति पर निर्भर रहने की आवश्यकता कम हो सकती है।

इच्छाशक्ति से अधिक उपयोगी है स्पष्ट योजना

कई बार व्यक्ति किसी कार्य के लिए दृढ़ संकल्प करता है, लेकिन उसे यह स्पष्ट नहीं होता कि वह कार्य कब, कहाँ और किस प्रकार करेगा।

उदाहरण के लिए, वह कहता है—“अब मैं नियमित अध्ययन करूँगा।”

यह एक अच्छा उद्देश्य है, लेकिन इसमें व्यवहार की स्पष्ट योजना नहीं है।

इसके स्थान पर यदि वह कहता है—“मैं प्रतिदिन सुबह सात बजे अपने अध्ययन कक्ष में बैठकर तीस मिनट अध्ययन करूँगा”, तो उसके व्यवहार के लिए एक स्पष्ट संरचना बन जाती है।

मनोविज्ञान में इस प्रकार की योजनाओं को Implementation Intentions कहा जाता है। इनका सामान्य स्वरूप है—

यदि अमुक परिस्थिति उत्पन्न होगी, तो मैं अमुक व्यवहार करूँगा।

उदाहरण के लिए—

“यदि अध्ययन के समय मोबाइल देखने की इच्छा होगी, तो मैं मोबाइल को छुए बिना अपना अध्ययन जारी रखूँगा।”

“यदि मुझे किसी बात पर क्रोध आएगा, तो मैं तत्काल उत्तर देने के बजाय कुछ समय रुकूँगा।”

“यदि किसी दिन मेरा नियमित अभ्यास छूट जाएगा, तो अगले दिन पुनः आरम्भ करूँगा।”

इस प्रकार व्यक्ति केवल उद्देश्य निर्धारित नहीं करता, बल्कि संभावित बाधाओं के लिए पहले से व्यवहार की योजना भी बनाता है।

यह विधि आत्मनियंत्रण को अधिक व्यावहारिक बनाती है।

इच्छा की तीव्रता और उसका अस्थायी स्वरूप

किसी इच्छा के उत्पन्न होने पर मनुष्य कई बार यह अनुभव करता है कि उसे तत्काल पूरा करना आवश्यक है।

लेकिन इच्छा की तीव्रता समय के साथ बदल सकती है।

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को अचानक किसी वस्तु को खरीदने की तीव्र इच्छा होती है। यदि वह तत्काल खरीदने के बजाय कुछ समय प्रतीक्षा करता है, तो सम्भव है कि उसकी इच्छा की तीव्रता कम हो जाए या वह उस वस्तु की आवश्यकता को नए सिरे से देख सके।

इसी प्रकार, क्रोध की तीव्र अवस्था में व्यक्ति जो कहना चाहता है, कुछ समय बाद उसे कहने की आवश्यकता कम अनुभव कर सकता है।

इसलिए आत्मनियंत्रण के लिए एक उपयोगी अभ्यास है—इच्छा को आदेश न मानकर एक मानसिक घटना के रूप में देखना।

व्यक्ति स्वयं से कह सकता है—

“मेरे भीतर यह इच्छा उत्पन्न हुई है। यह अभी तीव्र है, लेकिन इसकी तीव्रता बदल सकती है। मुझे इसका पालन तत्काल करना आवश्यक नहीं है।”

यह दृष्टिकोण इच्छा के प्रति संघर्ष को कम कर सकता है और व्यक्ति को अपने व्यवहार का चयन करने का अवसर दे सकता है।

आत्मनियंत्रण में असफलता और आत्मदोष

जब व्यक्ति अपने किसी निश्चय का पालन नहीं कर पाता, तो वह प्रायः स्वयं को दोष देने लगता है।

वह कहता है—

“मैं कभी नहीं बदल सकता।”

“मुझमें कोई अनुशासन नहीं है।”

“मैं हमेशा अपनी आदतों का गुलाम रहूँगा।”

ऐसी धारणाएँ व्यक्ति के आत्मविश्वास को कम कर सकती हैं और सुधार की प्रक्रिया को कठिन बना सकती हैं।

किसी एक दिन अभ्यास छूट जाना, क्रोध में अनुचित शब्द बोल देना या किसी पुरानी आदत में लौट जाना यह सिद्ध नहीं करता कि व्यक्ति में परिवर्तन की क्षमता नहीं है।

यह घटना केवल यह बताती है कि उस परिस्थिति में उसकी पुरानी प्रवृत्ति अधिक प्रभावशाली रही।

अब आवश्यक है कि वह उस परिस्थिति का अध्ययन करे।

उस समय क्या हुआ था? क्या वह थका हुआ था? क्या वातावरण में कोई विशेष आकर्षण था? क्या उसका उद्देश्य बहुत बड़ा या अस्पष्ट था? क्या उसने किसी भावनात्मक दबाव के कारण पुरानी आदत अपनाई?

इन प्रश्नों से व्यक्ति अपने व्यवहार के कारणों को समझ सकता है।

आत्मनियंत्रण का विकास आत्मदंड से नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण, सुधार और निरन्तर अभ्यास से अधिक प्रभावी ढंग से हो सकता है।

भारतीय दर्शन में आत्मनियंत्रण

भारतीय दर्शन में मन के नियमन और आत्मसंयम को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

भगवद्गीता में मनुष्य को अपने उत्थान के लिए स्वयं प्रयास करने का निर्देश मिलता है—

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
— भगवद्गीता ६.५

अर्थात् मनुष्य अपने द्वारा अपना उत्थान करे, स्वयं को नीचे न गिराए। मनुष्य स्वयं अपना मित्र भी है और स्वयं अपना शत्रु भी।

इस श्लोक का एक व्यावहारिक अर्थ यह समझा जा सकता है कि मनुष्य का अपना मानसिक व्यवहार उसके विकास में सहयोगी भी हो सकता है और बाधक भी।

यदि वह अपनी प्रवृत्तियों को समझे, उन्हें उचित दिशा दे और अपने उद्देश्य के अनुरूप व्यवहार विकसित करे, तो उसका मन उसके लिए सहयोगी बन सकता है।

यदि वह अपनी प्रवृत्तियों के प्रति पूरी तरह असजग रहे और प्रत्येक आवेग के अनुसार व्यवहार करे, तो वही मन उसके लिए कठिनाइयाँ उत्पन्न कर सकता है।

योगदर्शन में भी अभ्यास और वैराग्य के माध्यम से चित्त के नियमन की बात कही गई है।

यहाँ अभ्यास का अर्थ है बार-बार उचित दिशा में प्रयास करना, जबकि वैराग्य का अर्थ है अनावश्यक आसक्ति और मानसिक आग्रह को कम करना।

इन विचारों का आधुनिक मनोविज्ञान से सम्बन्ध स्थापित करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि दोनों की भाषा, उद्देश्य और सिद्धान्त पूरी तरह समान नहीं हैं। फिर भी आत्मनिरीक्षण, अभ्यास और व्यवहार के नियमन के विषय में इनके बीच सार्थक संवाद सम्भव है।

आत्मनियंत्रण विकसित करने का सात-दिवसीय अभ्यास

आत्मनियंत्रण को समझने के लिए किसी एक छोटे व्यवहार का चयन कीजिए।

उदाहरण के लिए—काम के समय मोबाइल देखना, क्रोध में तत्काल उत्तर देना, कार्य टालना या अनियमित अध्ययन।

अगले सात दिनों तक निम्न प्रक्रिया अपनाइए।

पहला दिन — व्यवहार की पहचान- यह लिखिए कि आप किस व्यवहार को बदलना चाहते हैं। उसे स्पष्ट और मापने योग्य बनाइए।

दूसरा दिन — संकेत की पहचान- देखिए कि वह व्यवहार कब और किन परिस्थितियों में स्वतः उत्पन्न होता है।

तीसरा दिन — वातावरण में परिवर्तन -ऐसा छोटा परिवर्तन कीजिए जिससे उचित व्यवहार सरल और अवांछित व्यवहार कठिन हो जाए।

चौथा दिन — विराम का अभ्यास -जब पुरानी इच्छा उत्पन्न हो, तो तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ समय रुकिए और अपनी मानसिक अवस्था को पहचानिए।

पाँचवाँ दिन — स्पष्ट योजना -एक वाक्य बनाइए—“यदि अमुक परिस्थिति उत्पन्न होगी, तो मैं अमुक व्यवहार करूँगा।”

छठा दिन — असफलता का निरीक्षण -यदि किसी परिस्थिति में पुरानी आदत लौट आए, तो स्वयं को दोष देने के बजाय उसके कारण को समझिए।

सातवाँ दिन — समीक्षा -देखिए कि आपके व्यवहार में क्या परिवर्तन आया। क्या किसी परिस्थिति में आत्मनियंत्रण सरल हुआ? क्या कोई विशेष संकेत बार-बार सामने आया? क्या वातावरण में परिवर्तन उपयोगी रहा?

इस अभ्यास का उद्देश्य सात दिनों में पूर्ण परिवर्तन प्राप्त करना नहीं है। इसका उद्देश्य आत्मनियंत्रण की प्रक्रिया को प्रत्यक्ष रूप से समझना है।

निष्कर्ष : आत्मनियंत्रण मन पर विजय नहीं, मन के साथ संतुलन है

मनुष्य का मन अनेक इच्छाओं, भावनाओं, आवेगों और स्वतः सक्रिय होने वाली प्रवृत्तियों से बना हुआ है। इन सभी को समाप्त कर देना न सम्भव है और न आवश्यक।

जीवन में संतुलन तब विकसित होता है जब व्यक्ति अपनी मानसिक प्रवृत्तियों को पहचानना सीखता है, उनके प्रभाव को समझता है और परिस्थितियों के अनुसार अपने व्यवहार का चयन करता है।

आत्मनियंत्रण का अर्थ स्वयं को कठोर अनुशासन में बाँध देना नहीं है। इसका अर्थ है अपने भीतर उत्पन्न होने वाली प्रत्येक इच्छा को अनिवार्य आदेश न मानना।

इच्छाशक्ति उपयोगी है, लेकिन उसके साथ स्पष्ट उद्देश्य, अनुकूल वातावरण, नियमित अभ्यास और स्वयं के प्रति समझ भी आवश्यक है।

जब मनुष्य अपने आवेगों के बीच विराम स्थापित करना सीखता है, तब उसके व्यवहार में एक नई सम्भावना जन्म लेती है। वह केवल अपनी पुरानी मानसिक आदतों के अनुसार जीने के बजाय अपने जीवन को अधिक सजगता से संचालित कर सकता है।

मनुष्य की वास्तविक स्वतंत्रता केवल इच्छाएँ रखने में नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं के प्रति सजग होकर उनका उचित चयन करने में है।

इस प्रकार आत्मनियंत्रण अचेतन मन को समझने और उसके साथ संतुलित सम्बन्ध स्थापित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण चरण बन जाता है।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र

(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)


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