अध्याय–14 : अतीत के अनुभवों का वर्तमान जीवन पर प्रभाव

 अध्याय–14 : अतीत के अनुभवों का वर्तमान जीवन पर प्रभाव

क्या हमारा बीता हुआ समय आज भी हमारे विचारों, भावनाओं और व्यवहार को संचालित करता है?

मनुष्य वर्तमान में जीता हुआ दिखाई देता है, लेकिन उसका मन केवल वर्तमान तक सीमित नहीं रहता। उसके भीतर बीते हुए अनुभवों की अनेक परतें सक्रिय रहती हैं। बचपन में सुनी हुई कोई बात, किसी व्यक्ति का व्यवहार, किसी असफलता से मिली चोट, प्रेम में मिला विश्वास या विश्वासघात, अपमान का कोई क्षण अथवा जीवन में घटित कोई सुखद घटना—ये सब समय बीत जाने के बाद भी मनुष्य के भीतर किसी न किसी रूप में बने रह सकते हैं।

कभी कोई व्यक्ति छोटी-सी बात पर अत्यधिक क्रोधित हो जाता है, कभी सामान्य आलोचना भी उसे गहरे तक आहत कर देती है और कभी वह किसी ऐसे अवसर से भी पीछे हट जाता है जिसमें सफलता की पूरी सम्भावना होती है। इन प्रतिक्रियाओं का कारण हमेशा वर्तमान परिस्थिति नहीं होती। कई बार वर्तमान घटना अतीत के किसी अनुभव को सक्रिय कर देती है और व्यक्ति अनजाने में आज की परिस्थिति को बीते हुए समय की दृष्टि से देखने लगता है।

इसलिए अतीत को समझना केवल स्मृतियों का अध्ययन करना नहीं है। यह समझना भी है कि हमारा बीता हुआ जीवन हमारे वर्तमान मन को किस प्रकार प्रभावित कर रहा है।

अतीत मन में किस रूप में सुरक्षित रहता है?

हमारा मस्तिष्क अनुभवों को केवल घटनाओं के रूप में सुरक्षित नहीं रखता। किसी घटना के साथ जुड़ी भावना, उससे प्राप्त अर्थ, उस समय बनी धारणा और उसके बाद अपनाया गया व्यवहार भी भविष्य के अनुभवों को प्रभावित कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए, किसी बच्चे को बार-बार यह सुनने को मिलता है कि वह किसी काम के योग्य नहीं है। सम्भव है कि वह बड़ा होकर पढ़ाई, नौकरी या किसी नए काम में अपनी क्षमता पर संदेह करने लगे। उसे हर बार कोई व्यक्ति यह नहीं कह रहा होगा कि वह अयोग्य है, फिर भी उसके भीतर पहले से बनी धारणा सक्रिय हो सकती है।

इसी प्रकार, यदि किसी व्यक्ति को जीवन में किसी ने धोखा दिया है, तो आगे चलकर वह नए सम्बन्धों में भी अत्यधिक सावधानी बरत सकता है। वह प्रत्येक व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखने लगे, जबकि वर्तमान व्यक्ति ने उसके साथ अभी तक कोई गलत व्यवहार नहीं किया है।

इस प्रकार अतीत के अनुभव तीन स्तरों पर वर्तमान को प्रभावित कर सकते हैं।

पहला, स्मृति के स्तर पर—व्यक्ति को पुरानी घटनाएँ याद आती हैं।

दूसरा, भावनात्मक स्तर पर—पुरानी घटनाओं से जुड़ी भावनाएँ वर्तमान परिस्थितियों में फिर से अनुभव होने लगती हैं।

तीसरा, व्यवहार के स्तर पर—व्यक्ति अतीत में सीखे हुए तरीकों के अनुसार प्रतिक्रिया देने लगता है।

इन तीनों स्तरों का प्रभाव हमेशा एक जैसा नहीं होता। कोई व्यक्ति किसी घटना को याद तो कर सकता है, लेकिन उससे भावनात्मक रूप से प्रभावित न हो। इसके विपरीत, कभी-कभी उसे घटना स्पष्ट रूप से याद भी नहीं रहती, फिर भी उससे जुड़ी सीखी हुई प्रतिक्रिया उसके व्यवहार को प्रभावित कर सकती है।

बचपन के अनुभव और मानसिक संरचना

बचपन मनुष्य के मानसिक विकास का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समय है। इस अवधि में बच्चा अपने परिवार, आसपास के लोगों और सामाजिक वातावरण से स्वयं तथा संसार के विषय में अनेक धारणाएँ बनाता है।

वह धीरे-धीरे सीखता है कि संसार सुरक्षित है या असुरक्षित, लोग भरोसे के योग्य हैं या नहीं, प्रेम पाने के लिए उसे कैसा व्यवहार करना चाहिए और असफल होने पर उसके साथ कैसा व्यवहार होगा।

यदि बच्चे को परिवार में सम्मान, सुरक्षा और भावनात्मक सहयोग मिलता है, तो उसके भीतर आत्मविश्वास और सम्बन्धों के प्रति विश्वास विकसित होने की सम्भावना बढ़ती है। इसके विपरीत, निरन्तर अपमान, उपेक्षा, भय या अस्थिर वातावरण उसके भीतर असुरक्षा और आत्मसंदेह को बढ़ा सकता है।

लेकिन यह समझना आवश्यक है कि बचपन की कोई एक घटना किसी व्यक्ति का पूरा भविष्य निर्धारित नहीं कर देती। मनुष्य का विकास अनेक अनुभवों, सम्बन्धों, परिस्थितियों और बाद में प्राप्त सहयोग से प्रभावित होता है। कठिन बचपन के बावजूद व्यक्ति स्वस्थ और संतुलित जीवन विकसित कर सकता है।

यहाँ महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि बचपन में बनी धारणाएँ वयस्क जीवन में किस प्रकार सक्रिय रहती हैं।

मान लीजिए, एक व्यक्ति को बचपन में अपनी बात रखने पर बार-बार डाँटा गया। वह धीरे-धीरे चुप रहना सीख गया। बड़ा होने पर भी वह अपने विचार व्यक्त करने से बच सकता है। उसे किसी ने वर्तमान में चुप रहने के लिए बाध्य नहीं किया, फिर भी पुराना सीखा हुआ व्यवहार उसके सामने आने वाले अवसरों को प्रभावित कर रहा है।

इसका अर्थ है कि वर्तमान व्यवहार को समझने के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि व्यक्ति अभी क्या कर रहा है। यह भी देखना आवश्यक है कि उसने ऐसा करना कब और किन परिस्थितियों में सीखा था।

स्मृति और भावना का सम्बन्ध

किसी घटना की स्मृति केवल उसके दृश्य या शब्दों तक सीमित नहीं रहती। उसके साथ जुड़ी भावनाएँ भी भविष्य में उस स्मृति को सक्रिय करने में भूमिका निभा सकती हैं।

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को किसी विशेष स्थान पर अपमानित किया गया हो। वर्षों बाद वह उसी स्थान पर पहुँचता है। वहाँ कोई अपमानजनक घटना नहीं घटती, फिर भी उसके भीतर बेचैनी उत्पन्न हो सकती है।

ऐसा इसलिए हो सकता है कि वर्तमान स्थान ने पुराने अनुभव से जुड़े संकेतों को सक्रिय कर दिया हो।

मनोविज्ञान में भावनात्मक स्मृति के अध्ययन से यह समझने में सहायता मिलती है कि भय, प्रसन्नता, दुःख और तनाव से जुड़े अनुभव भविष्य की प्रतिक्रियाओं को किस प्रकार प्रभावित कर सकते हैं।

विशेष रूप से भय से जुड़े अनुभवों में व्यक्ति कभी-कभी उन परिस्थितियों से भी बचने लगता है जो पहले की घटना से केवल कुछ समानता रखती हैं।

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से बोलते समय अपमान का सामना करना पड़ा। इसके बाद वह सभा में बोलने से बच सकता है। धीरे-धीरे उसका मन सार्वजनिक बोलने की परिस्थिति को ही खतरे से जोड़ने लगता है।

यहाँ वर्तमान परिस्थिति वास्तविक रूप से उतनी खतरनाक नहीं होती, जितनी मन उसे अनुभव कराता है।

इसलिए अतीत की स्मृति और वर्तमान की वास्तविकता के बीच अन्तर पहचानना आत्मबोध की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

अतीत से बनी धारणाएँ वर्तमान को कैसे प्रभावित करती हैं?

मनुष्य प्रत्येक नई परिस्थिति को पूरी तरह नए सिरे से नहीं देखता। वह अपने पूर्व अनुभवों और उनसे बनी धारणाओं के आधार पर भी उसका अर्थ निकालता है।

यदि किसी व्यक्ति के भीतर यह धारणा बन गई है कि लोग अन्ततः उसे छोड़ देंगे, तो वह किसी सम्बन्ध में थोड़ी दूरी आते ही असुरक्षित अनुभव कर सकता है।

यदि उसे लगता है कि असफलता का अर्थ अपमान है, तो वह कठिन काम शुरू करने से पहले ही पीछे हट सकता है।

यदि उसने यह मान लिया है कि उसकी बात का कोई महत्त्व नहीं है, तो वह अपने अधिकारों और आवश्यकताओं को व्यक्त करने से बच सकता है।

इन धारणाओं की विशेषता यह है कि व्यक्ति कई बार इन्हें सत्य मानकर चलता रहता है। वह यह जाँचने का प्रयास नहीं करता कि ये धारणाएँ वर्तमान परिस्थितियों में भी सही हैं या केवल पुराने अनुभवों से बनी हुई हैं।

यहीं अतीत वर्तमान पर अपना प्रभाव स्थापित करता है।

इस प्रभाव को समझने के लिए एक महत्त्वपूर्ण अन्तर पहचानना चाहिए—घटना और घटना से बनी धारणा एक ही चीज नहीं हैं।

उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति ने एक बार किसी काम में असफलता प्राप्त की। यह एक घटना है। लेकिन यदि वह इससे यह निष्कर्ष निकाल ले कि वह जीवन में कभी सफल नहीं हो सकता, तो यह घटना से बनी धारणा है।

घटना बीत चुकी है, लेकिन उससे बनी धारणा वर्तमान में सक्रिय रह सकती है।

इसलिए आत्मनिरीक्षण में केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि मेरे साथ क्या हुआ था। यह पूछना भी आवश्यक है कि उस घटना के बाद मैंने अपने विषय में क्या मान लिया था।

अतीत के अनुभव और सम्बन्धों का व्यवहार

मनुष्य के वर्तमान सम्बन्धों में अतीत का प्रभाव विशेष रूप से दिखाई देता है।

किसी व्यक्ति को पहले किसी निकट सम्बन्ध में विश्वासघात का सामना करना पड़ा हो, तो वह नए सम्बन्ध में भी विश्वास करने में कठिनाई अनुभव कर सकता है। किसी को पहले लगातार आलोचना मिली हो, तो वह सामान्य सुझाव को भी अपमान समझ सकता है।

कभी-कभी व्यक्ति वर्तमान में अपने सामने उपस्थित व्यक्ति से नहीं, बल्कि अपने अतीत में मिले किसी व्यक्ति से भावनात्मक रूप से प्रतिक्रिया कर रहा होता है।

उदाहरण के लिए, किसी पति या पत्नी का सामान्य प्रश्न भी दूसरे व्यक्ति को आरोप जैसा अनुभव हो सकता है। सम्भव है कि उसके पूर्व अनुभवों में प्रश्न पूछना हमेशा संदेह या नियंत्रण से जुड़ा रहा हो।

इसका अर्थ यह नहीं कि हर वैवाहिक विवाद का कारण अतीत ही होता है। वर्तमान व्यवहार, संवाद की कमी, वास्तविक मतभेद और सामाजिक परिस्थितियाँ भी सम्बन्धों को प्रभावित करती हैं। लेकिन अतीत से बनी संवेदनशीलता कई बार सामान्य मतभेद को भी बड़ा संघर्ष बना सकती है।

यदि व्यक्ति अपनी प्रतिक्रिया के पीछे छिपे पुराने अनुभव को पहचान ले, तो वह वर्तमान सम्बन्ध को अतीत की घटनाओं से अलग करके देखने में अधिक सक्षम हो सकता है।

क्या अतीत को भूल जाना ही मुक्ति है?

अतीत के प्रभाव से मुक्त होने का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य अपनी पुरानी स्मृतियों को मिटा दे।

स्मृति जीवन की आवश्यक मानसिक क्षमता है। उसी के कारण मनुष्य अनुभवों से सीखता है, सम्बन्धों को पहचानता है, गलतियों से बचता है और भविष्य की योजनाएँ बनाता है।

समस्या स्मृति में नहीं, बल्कि तब उत्पन्न होती है जब पुराना अनुभव वर्तमान की वास्तविकता को देखने की हमारी क्षमता पर अनावश्यक अधिकार जमा लेता है।

मान लीजिए, किसी व्यक्ति ने एक बार किसी पर विश्वास करके हानि उठाई। उससे सीख लेना बुद्धिमानी है। लेकिन उसके बाद जीवन में किसी पर भी विश्वास न कर पाना उस सीख का संतुलित उपयोग नहीं है।

इसी प्रकार, एक बार असफल होने के बाद सावधानी बरतना उचित है, लेकिन हर नए प्रयास को असफलता की आशंका से रोक देना अतीत का अनुचित प्रभाव हो सकता है।

अतः उद्देश्य अतीत को मिटाना नहीं, बल्कि उसके साथ अपने सम्बन्ध को बदलना है।

मनुष्य को यह समझना होगा कि जो घटना पहले घट चुकी है, वह आज की परिस्थिति का अनिवार्य नियम नहीं बन जाती।

अतीत के प्रभाव को पहचानने की प्रक्रिया

अतीत के अनुभवों को समझने के लिए व्यक्ति को अपने वर्तमान व्यवहार का निरीक्षण करना चाहिए।

जब कोई प्रतिक्रिया आवश्यकता से अधिक तीव्र दिखाई दे, तो कुछ प्रश्न उपयोगी हो सकते हैं—

  • क्या मेरी प्रतिक्रिया वर्तमान घटना के अनुपात में है?

  • क्या इस परिस्थिति से मिलती-जुलती कोई पुरानी घटना मेरे जीवन में हुई थी?

  • उस पुरानी घटना के बाद मैंने अपने या दूसरों के विषय में क्या धारणा बना ली थी?

  • क्या मैं वर्तमान व्यक्ति या परिस्थिति को उसी पुरानी धारणा से देख रहा हूँ?

  • क्या वर्तमान में मेरे पास कोई नया तथ्य है, जिसके आधार पर मैं अलग प्रतिक्रिया दे सकता हूँ?

इन प्रश्नों का उद्देश्य अपने अतीत को दोष देना नहीं, बल्कि अपनी प्रतिक्रिया के स्रोत को समझना है।

यदि किसी पुरानी घटना से जुड़ी पीड़ा अत्यधिक तीव्र हो, बार-बार दुःस्वप्न आते हों, व्यक्ति सामान्य जीवन में कठिनाई अनुभव करता हो या आघात के लक्षण बने हुए हों, तो प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सहायता लेना उचित है। प्रत्येक मानसिक कठिनाई का समाधान केवल आत्मनिरीक्षण से सम्भव नहीं होता।

अतीत की मानसिक छाप को बदलने में अभ्यास की भूमिका

पुरानी मानसिक धारणाएँ प्रायः एक ही दिन में नहीं बनतीं। इसलिए उनका प्रभाव भी केवल एक बार सोच लेने से समाप्त नहीं होता।

इसके लिए नए अनुभवों, नए व्यवहार और वास्तविकता की बार-बार जाँच की आवश्यकता होती है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को अपनी बात रखने में कठिनाई होती है, तो वह छोटे और सुरक्षित अवसरों पर अपने विचार व्यक्त करने का अभ्यास कर सकता है। यदि उसे हर असफलता के बाद स्वयं को अयोग्य मानने की आदत है, तो वह असफलता को अपनी सम्पूर्ण पहचान के बजाय किसी विशेष प्रयास का परिणाम मानना सीख सकता है।

यदि किसी व्यक्ति को सम्बन्धों में अविश्वास की समस्या है, तो उसे आँख मूँदकर विश्वास करने की आवश्यकता नहीं है। वह धीरे-धीरे व्यवहार, निरन्तरता और पारस्परिक सम्मान के आधार पर विश्वास विकसित कर सकता है।

इस प्रकार नए अनुभव पुरानी धारणाओं को चुनौती देने लगते हैं।

यह प्रक्रिया मन को यह अवसर देती है कि वह अतीत में सीखे हुए व्यवहार के अतिरिक्त नए व्यवहार भी सीख सके।

भारतीय दर्शन में अतीत, संस्कार और वर्तमान

भारतीय दर्शन में अतीत के अनुभवों और वर्तमान मानसिक प्रवृत्तियों को समझने के लिए संस्कार, वासना और चित्त जैसे शब्दों का प्रयोग मिलता है।

योगदर्शन में संस्कार को मानसिक वृत्तियों और अनुभवों से बनने वाली सूक्ष्म छापों के रूप में समझा जाता है। ये छापें आगे चलकर समान प्रकार की वृत्तियों को उत्पन्न करने में सहायक हो सकती हैं।

पतञ्जलि योगसूत्र में अभ्यास और वैराग्य के माध्यम से चित्तवृत्तियों के नियमन की बात कही गई है—

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः॥
— योगसूत्र १.१२

अर्थात् अभ्यास और वैराग्य के माध्यम से चित्तवृत्तियों का निरोध होता है।

यहाँ अभ्यास का आशय केवल किसी क्रिया को दोहराने से नहीं, बल्कि चित्त को बार-बार उचित दिशा में स्थिर करने के प्रयास से है। वैराग्य का अर्थ अनुभवों से भागना नहीं, बल्कि उनके प्रति अनावश्यक आसक्ति और मानसिक बन्धन को कम करना है।

भगवद्गीता में भी मन को बार-बार उचित दिशा में लाने का निर्देश मिलता है—

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥
— भगवद्गीता ६.२६

अर्थात् चञ्चल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटकता है, वहाँ-वहाँ से उसे रोककर पुनः आत्मा में स्थिर करना चाहिए।

इन दार्शनिक विचारों को आधुनिक मनोविज्ञान की अवधारणाओं के समान मान लेना उचित नहीं होगा। फिर भी दोनों में एक महत्त्वपूर्ण संवाद दिखाई देता है—मनुष्य अपनी स्वतः उत्पन्न मानसिक प्रवृत्तियों का केवल निष्क्रिय दर्शक बनकर रहने के लिए बाध्य नहीं है। अभ्यास और जागरूकता के माध्यम से वह अपने व्यवहार को नई दिशा दे सकता है।

आत्मनिरीक्षण का एक व्यावहारिक प्रयोग

इस अध्याय को केवल सैद्धान्तिक जानकारी तक सीमित न रखते हुए एक छोटा प्रयोग किया जा सकता है।

अगले सात दिनों तक ऐसी तीन परिस्थितियों को लिखिए जिनमें आपकी प्रतिक्रिया सामान्य से अधिक तीव्र रही हो।

प्रत्येक परिस्थिति के लिए चार बातें दर्ज कीजिए—

पहली — वर्तमान घटना: वास्तव में क्या हुआ था?

दूसरी — मेरी प्रतिक्रिया: मैंने क्या महसूस किया और क्या किया?

तीसरी — सम्भावित पुराना सम्बन्ध: क्या यह प्रतिक्रिया मेरे किसी पुराने अनुभव से जुड़ी हो सकती है?

चौथी — नई सम्भावना: यदि यही परिस्थिति फिर आए, तो मैं कौन-सी अधिक संतुलित प्रतिक्रिया चुन सकता हूँ?

सात दिनों के बाद इन घटनाओं को पढ़िए। सम्भव है कि आपको अपनी कुछ प्रतिक्रियाओं में समानता दिखाई दे। यही समानता आपके भीतर सक्रिय किसी पुरानी धारणा या सीखे हुए व्यवहार की ओर संकेत कर सकती है।

यह प्रयोग किसी मानसिक समस्या का निदान नहीं है। इसका उद्देश्य स्वयं को अधिक स्पष्टता से समझना है।

निष्कर्ष : अतीत हमारा अनुभव है, हमारी नियति नहीं

मनुष्य अपने अतीत से पूरी तरह अलग होकर जीवन नहीं जी सकता। उसका वर्तमान व्यक्तित्व, उसकी स्मृतियाँ, उसकी भावनाएँ और उसके व्यवहार अनेक पुराने अनुभवों से प्रभावित होते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उसका भविष्य भी उन्हीं अनुभवों द्वारा निर्धारित होगा।

अतीत हमें सावधान कर सकता है, पर उसे हमें भयभीत करके रोकना आवश्यक नहीं है। अतीत हमें अनुभव दे सकता है, पर उसे हमारी पहचान बन जाना आवश्यक नहीं है। अतीत से बनी धारणाएँ हमारे व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं, पर जागरूकता और नए अनुभवों से उन धारणाओं की पुनः जाँच सम्भव है।

अचेतन मन को समझने की दिशा में यह एक महत्त्वपूर्ण खोज है कि मनुष्य कई बार वर्तमान में नहीं, बल्कि वर्तमान के भीतर सक्रिय अपने अतीत में प्रतिक्रिया कर रहा होता है।

जिस दिन वह इस अन्तर को पहचानना सीख जाता है, उसी दिन उसके भीतर एक नई सम्भावना जन्म लेती है—वह अपने अतीत का बन्दी बने रहने के बजाय अपने वर्तमान का सजग निर्माता बन सकता है।

अतीत को स्वीकार करना आवश्यक है, लेकिन भविष्य को अतीत के हवाले कर देना आवश्यक नहीं।

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र

(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

हरिवंश पुराण - तृतीय खंड — भाग 26 - द्वारका का विस्तार

हरिवंश पुराण - भाग ३० — बाणासुर :