अध्याय–13 : स्वभाव, व्यक्तित्व और व्यवहार का सम्बन्ध -

अचेतन मन को वश में कैसे करें - द्वितीय खण्ड — अचेतन मन की कार्यप्रणाली

अध्याय–13 : स्वभाव, व्यक्तित्व और व्यवहार का सम्बन्ध - हमारी मानसिक संरचना हमारे व्यवहार को कैसे प्रभावित करती है?

मनुष्य अपने व्यवहार को प्रायः अपनी इच्छा और निर्णय का परिणाम मानता है। वह सोचता है कि वह जैसा व्यवहार कर रहा है, वैसा उसने सोच-समझकर चुना है। लेकिन वास्तविकता इससे अधिक जटिल है। हमारे अनेक व्यवहार ऐसे होते हैं जिनके पीछे कोई स्पष्ट विचार या सचेत निर्णय दिखाई नहीं देता। कोई व्यक्ति छोटी-सी आलोचना पर क्रोधित हो जाता है, कोई असहमति होते ही चुप हो जाता है, कोई हर परिस्थिति में दूसरों को प्रसन्न रखने का प्रयास करता है और कोई सफलता मिलने पर भी अपने भीतर असफलता का भय अनुभव करता रहता है।

इन प्रतिक्रियाओं को केवल उस क्षण की परिस्थिति से नहीं समझा जा सकता। इनके पीछे व्यक्ति का स्वभाव, उसके पुराने अनुभव, सीखी हुई मान्यताएँ, भावनात्मक आदतें और मानसिक संरचना काम कर सकती हैं। यही कारण है कि एक ही परिस्थिति में दो व्यक्ति बिल्कुल अलग व्यवहार करते हैं।

इस अध्याय का उद्देश्य यह समझना है कि स्वभाव और व्यक्तित्व का निर्माण कैसे होता है, उनका व्यवहार से क्या सम्बन्ध है और अचेतन मानसिक प्रक्रियाएँ इस पूरे क्रम को किस प्रकार प्रभावित करती हैं।

स्वभाव और व्यक्तित्व में अन्तर

स्वभाव और व्यक्तित्व को सामान्य बातचीत में प्रायः एक ही अर्थ में प्रयोग किया जाता है, लेकिन दोनों में सूक्ष्म अन्तर है।

स्वभाव से आशय व्यक्ति की उन अपेक्षाकृत स्थायी प्रवृत्तियों से है जिनके कारण वह किसी परिस्थिति में एक विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया देने की ओर झुकता है। कोई व्यक्ति स्वाभाविक रूप से शांत होता है, कोई जल्दी उत्तेजित हो जाता है, कोई जोखिम लेने से बचता है और कोई नई परिस्थितियों को उत्सुकता से स्वीकार करता है।

व्यक्तित्व इससे अधिक व्यापक संरचना है। इसमें व्यक्ति का स्वभाव, सोचने का तरीका, भावनात्मक प्रवृत्तियाँ, आत्मबोध, सामाजिक व्यवहार, मूल्य, रुचियाँ और जीवन के प्रति दृष्टिकोण सम्मिलित होते हैं।

उदाहरण के लिए, दो व्यक्ति स्वभाव से अन्तर्मुखी हो सकते हैं, लेकिन उनका व्यक्तित्व एक जैसा होना आवश्यक नहीं है। उनमें से एक व्यक्ति आत्मविश्वासी, अध्ययनशील और स्वतंत्र विचारों वाला हो सकता है, जबकि दूसरा संकोची, असुरक्षित और दूसरों पर निर्भर रहने वाला हो सकता है।

अर्थात् स्वभाव व्यक्तित्व का एक महत्त्वपूर्ण आधार है, लेकिन व्यक्तित्व केवल स्वभाव तक सीमित नहीं है।

व्यक्तित्व का निर्माण कैसे होता है?

व्यक्तित्व किसी एक घटना, एक अनुभव अथवा किसी एक मानसिक विशेषता से निर्मित नहीं होता। इसका विकास अनेक कारकों के परस्पर प्रभाव से होता है।

जन्मजात प्रवृत्तियाँ: प्रत्येक व्यक्ति कुछ जैविक और आनुवंशिक प्रवृत्तियों के साथ जन्म लेता है। भावनात्मक संवेदनशीलता, उत्तेजना के प्रति प्रतिक्रिया, सक्रियता और नवीन परिस्थितियों के प्रति सहज प्रतिक्रिया में व्यक्तियों के बीच अन्तर हो सकता है। ये प्रवृत्तियाँ आगे चलकर व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित कर सकती हैं।

परिवार और प्रारम्भिक वातावरण: बचपन में बच्चे को मिलने वाला प्रेम, सुरक्षा, अनुशासन, प्रोत्साहन और उपेक्षा उसके मानसिक विकास को प्रभावित करते हैं। जिस बच्चे को अपनी बात कहने की स्वतंत्रता मिलती है, उसमें आत्मविश्वास विकसित होने की सम्भावना बढ़ सकती है। इसके विपरीत, निरन्तर अपमान या भय के वातावरण में पला बच्चा अपनी भावनाएँ व्यक्त करने से बचना सीख सकता है।

सामाजिक अनुभव: विद्यालय, मित्र, समाज, कार्यस्थल और पारिवारिक सम्बन्ध व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करते हैं। मनुष्य केवल अपने अनुभवों से नहीं सीखता, बल्कि दूसरों के व्यवहार को देखकर भी अनेक प्रतिक्रियाएँ सीखता है।

व्यक्तिगत अनुभव और उनकी व्याख्या: एक ही घटना दो व्यक्तियों के मन में अलग-अलग प्रभाव छोड़ सकती है। किसी व्यक्ति के लिए असफलता सीखने का अवसर हो सकती है, जबकि दूसरे के लिए वही घटना अपनी योग्यता पर प्रश्नचिह्न बन सकती है। घटना के साथ-साथ व्यक्ति उसे किस अर्थ में ग्रहण करता है, यह भी महत्त्वपूर्ण है।

जीवन के बदलते अनुभव: व्यक्तित्व अपेक्षाकृत स्थायी अवश्य होता है, लेकिन अपरिवर्तनीय नहीं। शिक्षा, सम्बन्ध, जिम्मेदारियाँ, कठिन परिस्थितियाँ, आत्मचिन्तन और नए अनुभव व्यक्ति की मानसिक प्रवृत्तियों में परिवर्तन ला सकते हैं।

इस प्रकार व्यक्तित्व को केवल जन्मजात गुणों का परिणाम नहीं कहा जा सकता और न ही उसे केवल वातावरण की देन माना जा सकता है। यह जैविक प्रवृत्तियों, अनुभवों, सीखने और व्यक्ति की अपनी सक्रिय भूमिका के बीच विकसित होने वाली संरचना है।

अचेतन मन और व्यवहार का सम्बन्ध

हमारा प्रत्येक व्यवहार सचेत निर्णय से उत्पन्न नहीं होता। अनेक बार किसी परिस्थिति को देखते ही मन में एक प्रतिक्रिया पैदा हो जाती है। उस प्रतिक्रिया के उत्पन्न होने और उसके प्रति जागरूक होने के बीच बहुत कम समय होता है।

मान लीजिए, किसी व्यक्ति को उसके अधिकारी ने एक सामान्य सुझाव दिया। वह सुझाव सुधार के उद्देश्य से दिया गया था, लेकिन व्यक्ति को तुरन्त अपमान का अनुभव हुआ। उसके चेहरे पर तनाव आ गया और उसने कठोर उत्तर दे दिया।

बाद में जब वह शांत हुआ, तब उसे महसूस हुआ कि उसकी प्रतिक्रिया आवश्यकता से अधिक तीव्र थी।

ऐसा क्यों हुआ?

सम्भव है कि उसके पुराने अनुभवों में आलोचना का सम्बन्ध अपमान, अस्वीकार या असफलता से जुड़ा रहा हो। वर्तमान में मिली सामान्य टिप्पणी ने उसी पुराने भावनात्मक सम्बन्ध को सक्रिय कर दिया हो। व्यक्ति ने वर्तमान परिस्थिति पर प्रतिक्रिया देने के बजाय अपने भीतर पहले से निर्मित किसी मानसिक प्रतिरूप के अनुसार प्रतिक्रिया दी।

यहाँ अचेतन मानसिक प्रक्रियाओं की भूमिका समझ में आती है। पहले के अनुभवों से निर्मित सम्बन्ध, अपेक्षाएँ और भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ वर्तमान व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं, जबकि व्यक्ति को उनके प्रभाव का तत्काल बोध नहीं होता।

हालाँकि प्रत्येक तीव्र प्रतिक्रिया के पीछे कोई दबा हुआ अनुभव ही हो, यह मान लेना उचित नहीं है। थकान, तनाव, शारीरिक अवस्था, वर्तमान परिस्थिति और सीखी हुई आदतें भी व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं।

व्यवहार की पुनरावृत्ति और व्यक्तित्व की स्थिरता

जब कोई व्यवहार बार-बार दोहराया जाता है, तो वह धीरे-धीरे व्यक्ति की सामान्य प्रतिक्रिया बन सकता है।

उदाहरण के लिए, किसी समस्या के सामने आते ही यदि व्यक्ति हर बार उससे बचने का प्रयास करता है, तो बचना उसकी सामान्य रणनीति बन सकती है। इसके विपरीत, यदि वह कठिनाई का सामना करने का अभ्यास करता है, तो धीरे-धीरे उसमें समस्या से निपटने का आत्मविश्वास विकसित हो सकता है।

इस प्रक्रिया को समझने के लिए एक सरल क्रम देखिए—

परिस्थिति

कोई घटना या चुनौती सामने आती है

मानसिक व्याख्या

व्यक्ति उस घटना का अर्थ निर्धारित करता है

भावनात्मक प्रतिक्रिया

भय, क्रोध, प्रसन्नता, संकोच या आत्मविश्वास

व्यवहार

व्यक्ति कुछ करता है या प्रतिक्रिया से बचता है

परिणाम और सीख

अनुभव भविष्य की प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करता है

यह क्रम हर परिस्थिति में बिल्कुल इसी तरह नहीं चलता, लेकिन व्यवहार के निर्माण और पुनरावृत्ति को समझने का उपयोगी मॉडल है।

यदि किसी व्यवहार से तत्काल राहत मिलती है, तो उसके दोहराए जाने की सम्भावना बढ़ सकती है। उदाहरण के लिए, कठिन बातचीत से बचने पर व्यक्ति को कुछ समय के लिए तनाव से मुक्ति मिलती है। यह राहत उसे भविष्य में भी बचने के लिए प्रेरित कर सकती है। धीरे-धीरे यह व्यवहार उसके व्यक्तित्व का स्थायी गुण दिखाई देने लगता है, जबकि वास्तव में वह सीखी हुई प्रतिक्रिया हो सकती है।

क्या व्यक्तित्व बदला जा सकता है?

अक्सर लोग अपने व्यवहार को अपनी स्थायी पहचान मान लेते हैं।

कोई कहता है, “मैं तो बहुत क्रोधी हूँ।”
कोई कहता है, “मुझमें आत्मविश्वास ही नहीं है।”
कोई स्वयं को हमेशा असफल मानता है।
और कोई कहता है, “मैं लोगों के सामने अपनी बात रख ही नहीं सकता।”

इन वाक्यों में व्यक्ति अपने व्यवहार को अपनी पहचान बना लेता है। वह यह नहीं देख पाता कि उसका वर्तमान व्यवहार उसकी पूरी सम्भावना नहीं है।

व्यक्तित्व में परिवर्तन सम्भव है, यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति में परिवर्तन की गति और सीमा अलग हो सकती है। परिवर्तन का अर्थ अपने स्वभाव को पूरी तरह मिटा देना नहीं, बल्कि अपनी अनुपयोगी प्रतिक्रियाओं को पहचानना और उनके स्थान पर अधिक संतुलित व्यवहार विकसित करना है।

एक संवेदनशील व्यक्ति को कठोर बनने की आवश्यकता नहीं है। उसे केवल इतना सीखना हो सकता है कि दूसरों की भावनाओं का सम्मान करते हुए अपनी सीमाएँ भी निर्धारित करे। इसी प्रकार शांत व्यक्ति को आक्रामक बनने की आवश्यकता नहीं, बल्कि आवश्यक अवसर पर अपनी बात स्पष्ट रूप से रखने का अभ्यास करना हो सकता है।

इसलिए व्यक्तित्व-विकास का लक्ष्य किसी दूसरे व्यक्ति जैसा बनना नहीं, बल्कि अपने व्यवहार को अधिक जागरूक, संतुलित और स्वतंत्र बनाना है।

अपने व्यवहार के पीछे छिपे मानसिक प्रतिरूप को पहचानना

अचेतन मन को समझने की दिशा में पहला व्यावहारिक कदम है—अपने व्यवहार का निरीक्षण करना।

जब कोई प्रतिक्रिया बार-बार दोहराई जाती है, तब स्वयं से कुछ प्रश्न पूछे जा सकते हैं।

  • किन परिस्थितियों में मेरी प्रतिक्रिया सबसे अधिक तीव्र होती है?

  • क्या मैं कुछ विशेष प्रकार के लोगों के सामने असहज हो जाता हूँ?

  • क्या मैं आलोचना को हमेशा अपमान समझता हूँ?

  • क्या मैं असफलता से बचने के लिए अवसरों को छोड़ देता हूँ?

  • क्या मैं अपनी इच्छा के विरुद्ध भी दूसरों को प्रसन्न करने का प्रयास करता हूँ?

  • क्या मेरी वर्तमान प्रतिक्रिया परिस्थिति के अनुरूप है, या किसी पुराने अनुभव से प्रभावित है?

इन प्रश्नों का उद्देश्य स्वयं को दोषी ठहराना नहीं है। इनका उद्देश्य अपने भीतर चल रही प्रक्रियाओं को समझना है।

व्यवहार-अवलोकन का एक सरल अभ्यास

अगले सात दिनों तक अपने किसी एक बार-बार दोहराए जाने वाले व्यवहार का निरीक्षण कीजिए। उदाहरण के लिए, क्रोध, संकोच, टालमटोल या अनावश्यक चिंता।

हर बार ऐसी प्रतिक्रिया होने पर चार बातें लिखिए—

  1. परिस्थिति: उस समय क्या हुआ था?

  2. विचार: मेरे मन में तत्काल क्या आया?

  3. भावना: मैंने क्या अनुभव किया?

  4. व्यवहार: मैंने क्या किया?

सात दिनों के बाद लिखे हुए अनुभवों को पढ़िए। सम्भव है कि आपको कुछ समानताएँ दिखाई दें। शायद आपका क्रोध किसी विशेष प्रकार की आलोचना से जुड़ा हो, आपका संकोच अधिकारपूर्ण व्यक्तियों के सामने बढ़ जाता हो या आपकी टालमटोल उन कार्यों में अधिक होती हो जिनमें असफलता का भय है।

यही समानताएँ आपके व्यवहार के पीछे सक्रिय मानसिक प्रतिरूपों को पहचानने में सहायता कर सकती हैं।

ध्यान रहे कि केवल सात दिनों का अवलोकन किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का अंतिम निष्कर्ष नहीं देता। यह आत्मनिरीक्षण की शुरुआत है।

भारतीय दर्शन में स्वभाव, संस्कार और व्यवहार

भारतीय दार्शनिक परम्परा में मनुष्य के स्वभाव और व्यवहार को समझने के लिए संस्कार, वासना, गुण और चित्तवृत्ति जैसे विचारों का उपयोग किया गया है।

योगदर्शन में संस्कारों को चित्त में बनी उन सूक्ष्म छापों के रूप में समझा जाता है जो आगे चलकर वृत्तियों और व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं। बार-बार की गई मानसिक और व्यवहारगत क्रियाएँ व्यक्ति के भीतर प्रवृत्तियों को दृढ़ कर सकती हैं।

भगवद्गीता में प्रकृति और गुणों के आधार पर मनुष्य के व्यवहार में भिन्नता की चर्चा मिलती है। सत्त्व, रजस् और तमस् को प्रकृति के तीन गुण कहा गया है। इनके प्रभाव से मनुष्य की सोच, कर्म, रुचि और प्रतिक्रिया में अलग-अलग प्रवृत्तियाँ दिखाई दे सकती हैं।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात समझनी चाहिए। आधुनिक मनोविज्ञान का व्यक्तित्व-विज्ञान और भारतीय दर्शन का गुण-संस्कार सम्बन्धी विवेचन अलग-अलग ज्ञान-परम्पराओं से आते हैं। दोनों में कुछ तुलनात्मक समानताएँ दिखाई दे सकती हैं, लेकिन उन्हें एक ही सिद्धान्त मानना उचित नहीं होगा।

फिर भी दोनों परम्पराओं में एक साझा प्रश्न उपस्थित होता है—क्या मनुष्य केवल अपनी तत्काल इच्छा के अनुसार व्यवहार करता है, अथवा उसके व्यवहार को प्रभावित करने वाली कुछ गहरी प्रवृत्तियाँ भी होती हैं?

इस प्रश्न का उत्तर हमें अपने भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करता है।

निष्कर्ष : स्वभाव को समझना, व्यवहार को बदलने की पहली शर्त है

हमारा व्यक्तित्व केवल हमारे द्वारा किए गए सचेत निर्णयों से नहीं बनता। उसमें जन्मजात प्रवृत्तियों, पारिवारिक वातावरण, सामाजिक अनुभवों, स्मृतियों, सीखी हुई आदतों और अचेतन मानसिक प्रक्रियाओं का योगदान होता है।

इसलिए अपने व्यवहार को बदलने के लिए केवल संकल्प करना पर्याप्त नहीं होता। यह समझना भी आवश्यक है कि कोई व्यवहार किन परिस्थितियों में उत्पन्न होता है, उसे कौन-सी मान्यता या भावना सक्रिय करती है और उसके दोहराए जाने से कौन-सी आदत मजबूत होती है।

जब मनुष्य अपने व्यवहार को अपनी अपरिवर्तनीय पहचान मानना छोड़ देता है, तभी उसमें परिवर्तन की सम्भावना खुलती है।

अचेतन मन को वश में करने का अर्थ अपने भीतर की प्रत्येक प्रवृत्ति को दबाना नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य उन मानसिक प्रक्रियाओं को पहचानना है जो बिना जागरूकता के हमारे व्यवहार को संचालित करती रहती हैं। पहचान के बाद ही उनमें विवेकपूर्ण परिवर्तन सम्भव होता है।

अगला अध्याय–14 : अतीत के अनुभवों का वर्तमान जीवन पर प्रभाव — बीती हुई घटनाएँ आज भी हमारे व्यवहार को कैसे संचालित करती हैं?

मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र

(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)

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