अध्याय–15 : निर्णय लेने की प्रक्रिया और अचेतन मन
शोधग्रन्थ — अचेतन मन को वश में कैसे करें - द्वितीय खण्ड — अचेतन मन की कार्यप्रणाली
अध्याय–15 : निर्णय लेने की प्रक्रिया और अचेतन मन - क्या हमारे निर्णय वास्तव में हमारी सचेत इच्छा से ही संचालित होते हैं?
मनुष्य अपने जीवन में प्रतिदिन सैकड़ों छोटे-बड़े निर्णय लेता है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक अनेक विकल्प उसके सामने आते हैं। क्या खाना है, किससे बात करनी है, किस काम को पहले करना है, किस व्यक्ति पर विश्वास करना है, किस परिस्थिति में चुप रहना है और कब विरोध करना है—ये सभी निर्णय हमारे मानसिक जीवन का हिस्सा हैं।
हम सामान्यतः मानते हैं कि निर्णय लेने से पहले हम सोचते हैं, विकल्पों पर विचार करते हैं और फिर अपनी इच्छा के अनुसार किसी एक विकल्प को चुन लेते हैं। लेकिन क्या निर्णय लेने की प्रक्रिया वास्तव में इतनी सरल है?
कई बार हम किसी व्यक्ति से पहली मुलाकात में ही सहज या असहज अनुभव करते हैं, जबकि हमारे पास उसके बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं होती। कभी हम किसी निर्णय को उचित मानते हुए भी उसे टालते रहते हैं। कभी किसी विकल्प को चुनने के बाद समझ नहीं पाते कि हमने उसे क्यों चुना। और कभी-कभी बहुत सोच-विचार करने के बाद भी वही निर्णय लेते हैं जिसकी ओर हमारा मन पहले से झुका हुआ था।
इन घटनाओं से एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता है—क्या हमारे निर्णय केवल तर्क और विवेक से बनते हैं, अथवा उनके पीछे स्मृतियों, भावनाओं, आदतों और अचेतन मानसिक प्रक्रियाओं का भी योगदान होता है?
इस अध्याय में हम इसी प्रश्न का अध्ययन करेंगे।
निर्णय क्या है?
निर्णय का सामान्य अर्थ है—उपलब्ध विकल्पों में से किसी एक को चुनना अथवा किसी कार्य को करने या न करने का निश्चय करना।
लेकिन मनोवैज्ञानिक दृष्टि से निर्णय केवल विकल्प चुनने की क्रिया नहीं है। इसमें कई मानसिक प्रक्रियाएँ एक साथ काम करती हैं।
सबसे पहले व्यक्ति किसी परिस्थिति को समझता है। फिर उसके सामने उपलब्ध विकल्पों का मानसिक मूल्यांकन होता है। प्रत्येक विकल्प के सम्भावित लाभ, हानि, जोखिम और परिणाम का अनुमान लगाया जाता है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति के पुराने अनुभव, भावनाएँ, वर्तमान आवश्यकताएँ और भविष्य की अपेक्षाएँ भी प्रभाव डालती हैं।
अन्ततः व्यक्ति किसी एक विकल्प को चुनता है और उसके अनुसार कार्य करता है।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि निर्णय लेने के लिए आवश्यक सभी सूचनाएँ हमेशा चेतन मन के सामने उपलब्ध नहीं होतीं। कई बार मस्तिष्क पहले से सीखी हुई जानकारी और अनुभवों के आधार पर बहुत तेजी से किसी परिस्थिति का मूल्यांकन कर लेता है।
इसी कारण कुछ निर्णय तत्काल होते हैं, जबकि कुछ निर्णयों के लिए लम्बे विचार-विमर्श की आवश्यकता पड़ती है।
निर्णय के दो प्रमुख मानसिक ढंग
आधुनिक संज्ञानात्मक मनोविज्ञान में निर्णय और विचार की प्रक्रियाओं को समझाने के लिए प्रायः दो प्रकार के मानसिक ढंगों की चर्चा की जाती है।
पहला—तेज और सहज प्रक्रिया।
इसमें व्यक्ति बिना लम्बे विचार-विमर्श के किसी परिस्थिति के प्रति प्रतिक्रिया देता है। यह प्रक्रिया अनुभव, अभ्यास, सीखे हुए सम्बन्धों और तत्काल संकेतों पर आधारित हो सकती है।
उदाहरण के लिए, अनुभवी चालक सड़क पर अचानक किसी बाधा को देखकर तुरन्त ब्रेक लगा देता है। उसे उस क्षण यह गणना नहीं करनी पड़ती कि ब्रेक कितनी शक्ति से दबाना है। वर्षों के अभ्यास ने उस प्रतिक्रिया को लगभग स्वचालित बना दिया है।
दूसरा—धीमी और विचारपूर्ण प्रक्रिया।
इसमें व्यक्ति जानबूझकर रुकता है, विकल्पों पर विचार करता है, प्रमाणों की जाँच करता है और सम्भावित परिणामों का मूल्यांकन करता है।
उदाहरण के लिए, नौकरी छोड़ने, नया व्यवसाय शुरू करने या किसी बड़ी आर्थिक जिम्मेदारी को स्वीकार करने से पहले व्यक्ति को विभिन्न पक्षों पर विचार करना पड़ता है।
इन दोनों प्रक्रियाओं को समझने के लिए मनोवैज्ञानिक डेनियल काह्नमैन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Thinking, Fast and Slow में System 1 और System 2 का मॉडल प्रस्तुत किया। यह मॉडल निर्णय प्रक्रिया को समझने का उपयोगी ढाँचा है, हालाँकि वास्तविक मस्तिष्क की कार्यप्रणाली इन दो अलग-अलग खानों में पूरी तरह विभाजित नहीं होती।
तेज निर्णय हमेशा गलत नहीं होते और धीमे निर्णय हमेशा सही नहीं होते। अनुभव के आधार पर लिया गया तत्काल निर्णय कई बार अत्यन्त कुशल हो सकता है, जबकि लम्बा विचार-विमर्श भी भ्रम और पूर्वाग्रह से प्रभावित हो सकता है।
अचेतन मन निर्णयों को कैसे प्रभावित करता है?
हमारे अनेक निर्णयों के पीछे ऐसी मानसिक प्रक्रियाएँ काम करती हैं जिनका हमें तत्काल बोध नहीं होता।
मान लीजिए, किसी व्यक्ति को दो नौकरी के प्रस्ताव मिलते हैं। एक नौकरी में अधिक वेतन है, लेकिन कार्यस्थल उसके लिए अपरिचित है। दूसरी नौकरी में वेतन कम है, लेकिन वातावरण जाना-पहचाना है।
वह व्यक्ति बार-बार सोचता है कि कौन-सा विकल्प बेहतर है। कागज पर लाभ-हानि लिखता है, मित्रों से सलाह लेता है और भविष्य की सम्भावनाओं का अनुमान लगाता है। फिर भी अन्ततः वह परिचित वातावरण वाली नौकरी चुनता है।
इसके पीछे केवल आर्थिक गणना नहीं, बल्कि सुरक्षा की आवश्यकता, अनिश्चितता का भय, पुराने अनुभव और परिवर्तन के प्रति उसकी मानसिक प्रवृत्ति भी काम कर सकती है।
यह आवश्यक नहीं कि व्यक्ति स्वयं इन सभी कारणों को पहचानता हो।
इस प्रकार अचेतन मानसिक प्रक्रियाएँ निर्णय के सामने उपलब्ध विकल्पों को प्रभावित कर सकती हैं, किसी विकल्प को अधिक आकर्षक बना सकती हैं अथवा किसी सम्भावित खतरे को वास्तविकता से अधिक बड़ा अनुभव करा सकती हैं।
भावनाएँ और निर्णय
कभी-कभी लोग मानते हैं कि अच्छा निर्णय वही है जो पूरी तरह तर्क पर आधारित हो और जिसमें भावनाओं का कोई स्थान न हो। लेकिन मनुष्य का मस्तिष्क इस प्रकार कार्य नहीं करता।
भावनाएँ निर्णय प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे हमें बताती हैं कि किसी परिस्थिति का हमारे लिए क्या महत्त्व है, किससे हमें लाभ या हानि का अनुभव हो सकता है और किस विकल्प को लेकर हम आश्वस्त या असहज हैं।
उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति अपने परिवार की सुरक्षा को बहुत महत्त्व देता है, तो वह अधिक आय वाले लेकिन अत्यधिक जोखिमपूर्ण विकल्प की अपेक्षा कम आय वाले सुरक्षित विकल्प को चुन सकता है।
यह निर्णय केवल भय का परिणाम नहीं है। इसके पीछे एक मूल्य भी हो सकता है—परिवार की सुरक्षा।
समस्या तब उत्पन्न होती है जब कोई भावना इतनी प्रबल हो जाती है कि वह अन्य सभी पक्षों को देखने की क्षमता कम कर देती है।
क्रोध में लिया गया निर्णय दूसरे व्यक्ति को दण्डित करने की इच्छा से प्रभावित हो सकता है। भय में लिया गया निर्णय सम्भावित अवसरों को भी खतरे की तरह दिखा सकता है। अत्यधिक आकर्षण में व्यक्ति किसी विकल्प के नकारात्मक पक्षों की उपेक्षा कर सकता है।
इसलिए निर्णय में भावनाओं को समाप्त करना आवश्यक नहीं है। आवश्यकता है कि भावनाओं को पहचाना जाए और उनके साथ विवेकपूर्ण विचार को भी स्थान दिया जाए।
पुराने अनुभव और निर्णय की दिशा
मनुष्य का मस्तिष्क वर्तमान परिस्थिति को समझने के लिए अपने पुराने अनुभवों का सहारा लेता है।
यदि किसी व्यक्ति को पहले किसी पर विश्वास करने के कारण हानि हुई है, तो वह भविष्य में नए लोगों पर विश्वास करने से पहले अधिक सावधानी बरत सकता है। यदि किसी ने किसी कार्य में बार-बार सफलता प्राप्त की है, तो वह उसी प्रकार के कार्य को चुनने में अधिक आत्मविश्वास अनुभव कर सकता है।
यह प्रक्रिया सामान्यतः उपयोगी है। पुराने अनुभव हमें हर परिस्थिति में शून्य से विचार करने की आवश्यकता से बचाते हैं।
लेकिन समस्या तब होती है जब अतीत का अनुभव वर्तमान परिस्थिति पर अनुचित रूप से आरोपित होने लगता है।
उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को एक बार व्यवसाय में हानि हुई। उसके बाद वह हर नए व्यवसाय को सम्भावित असफलता की दृष्टि से देखने लगा। अब उसके सामने कोई अच्छा अवसर भी आता है, तो उसका मन पहले ही खतरे की सम्भावनाएँ खोजने लगता है।
यहाँ पुराना अनुभव उपयोगी सावधानी देने के बजाय निर्णय की स्वतंत्रता को सीमित कर रहा है।
अर्थात् अनुभव से सीखना आवश्यक है, लेकिन अनुभव को स्थायी भय में बदल देना उचित नहीं।
निर्णय में काम करने वाले कुछ मानसिक पूर्वाग्रह
मनुष्य का मन हमेशा निष्पक्ष गणना नहीं करता। कई बार वह कुछ मानसिक शॉर्टकट अपनाता है। ये शॉर्टकट समय और मानसिक ऊर्जा बचाते हैं, लेकिन कुछ परिस्थितियों में निर्णय को गलत दिशा में ले जा सकते हैं।
पुष्टिकरण पूर्वाग्रह (Confirmation Bias): व्यक्ति अक्सर ऐसी जानकारी को अधिक महत्त्व देता है जो उसकी पहले से बनी धारणा का समर्थन करती है। विरोधी जानकारी को वह कम महत्त्व दे सकता है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति ने पहले ही मान लिया है कि कोई सहकर्मी उसके विरुद्ध है, तो वह सहकर्मी के सामान्य व्यवहार में भी विरोध के संकेत खोज सकता है।
हानि से बचने की प्रवृत्ति (Loss Aversion): मनुष्य कई बार समान लाभ प्राप्त करने की प्रसन्नता की अपेक्षा समान मात्रा की हानि से अधिक विचलित होता है। इस कारण वह सम्भावित लाभ वाले अवसरों से भी बच सकता है।
उपलब्धता पूर्वाग्रह (Availability Heuristic): जो घटनाएँ स्मृति में आसानी से आ जाती हैं, व्यक्ति उन्हें वास्तविकता से अधिक सामान्य या सम्भावित मान सकता है।
उदाहरण के लिए, किसी दुर्घटना की खबर बार-बार देखने के बाद व्यक्ति यात्रा के जोखिम को वास्तविक आँकड़ों से अधिक बड़ा समझ सकता है।
प्रतिबद्धता का पूर्वाग्रह (Sunk Cost Fallacy): व्यक्ति किसी कार्य में पहले ही बहुत समय, धन या श्रम लगा चुका हो, तो वह गलत दिशा स्पष्ट होने के बाद भी उसी कार्य को जारी रख सकता है। वह यह नहीं देख पाता कि आगे का निर्णय उपलब्ध वर्तमान तथ्यों के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल पुराने निवेश के कारण।
इन पूर्वाग्रहों को पहचानना अचेतन मन की कार्यप्रणाली समझने के लिए उपयोगी है। इनका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक निर्णय गलत होता है, बल्कि यह कि निर्णय प्रक्रिया में हमारी मानसिक सीमाएँ भी सक्रिय रहती हैं।
क्या मनुष्य अपने निर्णयों का वास्तविक कारण जानता है?
यह प्रश्न मनोविज्ञान और दर्शन दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण है।
कई बार व्यक्ति अपने निर्णय का कारण बाद में बताता है। वह कहता है कि उसने यह काम इसलिए किया क्योंकि यह उचित था, लाभदायक था या उसकी इच्छा थी।
लेकिन क्या यही कारण वास्तव में उसके निर्णय के पीछे सक्रिय थे?
मनोवैज्ञानिक शोधों में यह देखा गया है कि कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति अपने निर्णय के वास्तविक कारणों को पूरी तरह पहचान नहीं पाता। वह अपने व्यवहार के आधार पर एक ऐसा कारण प्रस्तुत कर सकता है जो उसे स्वयं भी उचित प्रतीत होता है।
इसे आत्मव्याख्या की सीमा के रूप में समझा जा सकता है।
उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति कहता है कि उसने किसी से सम्बन्ध इसलिए समाप्त किया क्योंकि दोनों के विचार नहीं मिलते थे। लेकिन गहराई से देखने पर यह भी सम्भव है कि वह व्यक्ति असहमति सहन नहीं कर पाता था अथवा सम्बन्ध में असुरक्षा अनुभव कर रहा था।
यहाँ यह दावा करना उचित नहीं होगा कि व्यक्ति का बताया हुआ कारण हमेशा गलत है। सम्भव है कि वही वास्तविक कारण हो। लेकिन यह सम्भावना बनी रहती है कि निर्णय के पीछे कुछ ऐसे प्रभाव भी रहे हों जिन्हें वह स्वयं स्पष्ट रूप से नहीं पहचान पाया।
इसलिए आत्मनिरीक्षण का उद्देश्य अपने हर निर्णय के पीछे कोई छिपा हुआ कारण खोजते रहना नहीं, बल्कि अपनी व्याख्याओं की जाँच करना है।
निर्णय लेने में विवेक की भूमिका
यदि अचेतन प्रक्रियाएँ हमारे निर्णयों को प्रभावित करती हैं, तो क्या इसका अर्थ यह है कि मनुष्य उनके अधीन है?
नहीं। अचेतन प्रभावों का होना और उन प्रभावों को पहचानकर अपने व्यवहार में परिवर्तन करना—दो अलग बातें हैं।
मनुष्य के पास विचार करने, प्रमाणों की जाँच करने, अपने उद्देश्य स्पष्ट करने और निर्णय को कुछ समय के लिए रोकने की क्षमता है। यही क्षमता उसे अपनी तत्काल प्रतिक्रियाओं से कुछ दूरी बनाने में सहायता देती है।
विवेक का अर्थ केवल अधिक सोचना नहीं है। विवेक का अर्थ है—उचित और अनुचित, वास्तविक और काल्पनिक, आवश्यक और अनावश्यक तथा तत्काल लाभ और दीर्घकालिक हित के बीच अन्तर कर पाना।
किसी निर्णय से पहले स्वयं से कुछ प्रश्न पूछना उपयोगी हो सकता है—
क्या मैं इस निर्णय को भय, क्रोध या अत्यधिक आकर्षण की स्थिति में ले रहा हूँ?
क्या मेरे पास पर्याप्त तथ्य हैं?
क्या मैं केवल अपनी पुरानी धारणा को सही सिद्ध करने वाली बातें देख रहा हूँ?
यदि मुझे इस निर्णय का कोई पूर्व अनुभव न होता, तो क्या मैं इसे इसी प्रकार देखता?
इस निर्णय का तत्काल और दीर्घकालिक परिणाम क्या हो सकता है?
क्या मुझे निर्णय लेने से पहले कुछ समय और विचार करना चाहिए?
इन प्रश्नों से हर बार सही निर्णय की गारंटी नहीं मिलती, लेकिन निर्णय की गुणवत्ता बेहतर बनाने में सहायता मिल सकती है।
भारतीय दर्शन में संकल्प, विकल्प और बुद्धि
भारतीय दर्शन में निर्णय प्रक्रिया को समझने के लिए मन और बुद्धि के बीच अन्तर पर विशेष ध्यान दिया गया है।
सांख्य और वेदान्त की परम्पराओं में अन्तःकरण के विभिन्न कार्यों का विवेचन मिलता है। सामान्य व्याख्या में मन को संकल्प-विकल्प का क्षेत्र माना जाता है, जबकि बुद्धि को निश्चय और विवेक से जोड़ा जाता है।
मन किसी विकल्प को स्वीकार करने और दूसरे को अस्वीकार करने के बीच चलता रहता है। बुद्धि उपलब्ध तथ्यों और विवेक के आधार पर निश्चय करने का कार्य करती है।
भगवद्गीता में भी बुद्धि, मन, इन्द्रिय और आत्मसंयम के सम्बन्ध पर चर्चा मिलती है। गीता का एक महत्त्वपूर्ण संदेश यह है कि मनुष्य को अपनी मानसिक प्रवृत्तियों का विवेकपूर्ण नियमन करना चाहिए, न कि प्रत्येक इच्छा या आवेग के पीछे चल पड़ना चाहिए।
योगदर्शन में भी चित्तवृत्तियों के निरोध की चर्चा आती है। इसका आशय मानसिक गतिविधियों को बलपूर्वक मिटा देना नहीं, बल्कि उनके प्रभाव से असंयमित रूप से संचालित न होना समझा जा सकता है।
इन भारतीय अवधारणाओं की तुलना आधुनिक निर्णय-मनोविज्ञान से की जा सकती है, लेकिन मन, बुद्धि और चित्त को आधुनिक मस्तिष्क-विज्ञान की किसी एक संरचना का सीधा पर्याय नहीं मानना चाहिए। दोनों की अपनी दार्शनिक पृष्ठभूमि और अध्ययन-पद्धति है।
अचेतन प्रभावों को पहचानने का व्यावहारिक अभ्यास
निर्णय प्रक्रिया को अधिक जागरूक बनाने के लिए एक सरल अभ्यास किया जा सकता है।
अगले सात दिनों में अपने किसी एक महत्त्वपूर्ण निर्णय का निरीक्षण कीजिए। यह कोई छोटा निर्णय भी हो सकता है, जैसे किसी व्यक्ति को उत्तर देना, कोई कार्य स्वीकार करना अथवा किसी काम को टालना।
निर्णय के समय निम्नलिखित बातें लिखिए—
पहला—विकल्प: मेरे सामने कौन-कौन से विकल्प थे?
दूसरा—भावना: किस विकल्प को चुनते समय मुझे कैसा अनुभव हुआ?
तीसरा—पुराना अनुभव: क्या मेरा कोई पुराना अनुभव इस निर्णय को प्रभावित कर रहा था?
चौथा—मान्यता: क्या मैं किसी ऐसी धारणा के आधार पर निर्णय ले रहा था जिसकी मैंने जाँच नहीं की?
पाँचवाँ—विवेकपूर्ण समीक्षा: यदि मैं कुछ समय बाद शांत मन से इस निर्णय को देखूँ, तो क्या मुझे यह उचित लगेगा?
कुछ समय बाद अपने लिखे हुए उत्तरों की समीक्षा कीजिए। धीरे-धीरे आपको यह समझने में सहायता मिलेगी कि आपके निर्णय किन परिस्थितियों में अधिक प्रभावित होते हैं और किन मानसिक प्रवृत्तियों के कारण आप कुछ विकल्पों की ओर झुकते हैं।
इस अभ्यास का उद्देश्य हर निर्णय पर संदेह करना नहीं है। इसका उद्देश्य निर्णय लेने की प्रक्रिया में जागरूकता बढ़ाना है।
निष्कर्ष : निर्णय की स्वतंत्रता जागरूकता से विकसित होती है
मनुष्य का प्रत्येक निर्णय केवल तर्क का परिणाम नहीं होता। उसमें भावनाएँ, स्मृतियाँ, आदतें, अनुभव, पूर्वाग्रह और अचेतन मानसिक प्रक्रियाएँ भी योगदान करती हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपने निर्णयों का स्वामी नहीं है। इसका अर्थ केवल इतना है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया हमारी सामान्य समझ से अधिक गहरी और जटिल है।
जब हम अपने निर्णयों के पीछे सक्रिय भावनाओं, पुरानी मान्यताओं और मानसिक पूर्वाग्रहों को पहचानना सीखते हैं, तब हम केवल प्रतिक्रिया देने के बजाय विचारपूर्वक चुनाव करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं।
अचेतन मन को वश में करने की यात्रा में यह एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। क्योंकि जब तक मनुष्य यह नहीं समझता कि उसके निर्णय किस प्रकार बनते हैं, तब तक वह अपने व्यवहार को पूरी तरह समझने का दावा नहीं कर सकता।
अगला अध्याय–16 : आत्मनियंत्रण और इच्छाशक्ति — मनुष्य अपने मन की तत्काल प्रवृत्तियों पर नियंत्रण कैसे विकसित करता है?
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