अचेतन मन को वश में कैसे करें - प्रथम खण्ड — अचेतन मन का स्वरूप - अध्याय–४
अचेतन मन को वश में कैसे करें - प्रथम खण्ड — अचेतन मन का स्वरूप - अध्याय–४ : अवचेतन और अचेतन — समानता, भिन्नता और भ्रम
मनुष्य अपने मन को जितना जानता है, उससे कहीं अधिक मानसिक प्रक्रियाएँ ऐसी होती हैं जिनसे वह अनजान रहता है। कई बार हम कोई काम बिना सोचे कर जाते हैं, किसी परिस्थिति में अचानक प्रतिक्रिया दे बैठते हैं अथवा कोई पुरानी घटना अनायास हमारी स्मृति में लौट आती है। कभी ऐसा भी होता है कि हम किसी बात को याद करना चाहते हैं, लेकिन वह याद नहीं आती; कुछ समय बाद वही बात अचानक स्मरण हो जाती है।
इन सभी अनुभवों को सामान्य भाषा में प्रायः अवचेतन मन या अचेतन मन की क्रिया कह दिया जाता है। लेकिन क्या अवचेतन और अचेतन वास्तव में एक ही हैं? क्या मन के भीतर ये दो अलग-अलग स्तर हैं? क्या प्रत्येक ऐसी मानसिक क्रिया, जिसका हमें ज्ञान नहीं है, अचेतन मन का परिणाम है?
इन प्रश्नों का उत्तर समझना आवश्यक है, क्योंकि अचेतन मन को समझने और उस पर नियंत्रण विकसित करने की दिशा में यह एक महत्त्वपूर्ण आधार है।
अवचेतन और अचेतन शब्दों का अर्थ
सामान्य हिन्दी लेखन में अवचेतन और अचेतन शब्दों का प्रयोग कई बार एक-दूसरे के स्थान पर किया जाता है। लोकप्रिय मनोविज्ञान की पुस्तकों में भी इन दोनों के अर्थ हमेशा एक समान नहीं मिलते। कहीं अवचेतन को चेतन मन के नीचे स्थित मानसिक क्षेत्र बताया जाता है, तो कहीं अचेतन को उन सभी मानसिक प्रक्रियाओं का नाम दे दिया जाता है जिनका मनुष्य को प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता।
लेकिन इन शब्दों का अर्थ समझने के लिए केवल उनके शाब्दिक अर्थ पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है।
अवचेतन का सामान्य अर्थ उस मानसिक सामग्री या प्रक्रिया से लिया जा सकता है जो इस समय हमारी चेतना में उपस्थित नहीं है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर अपेक्षाकृत सरलता से चेतना में आ सकती है।
उदाहरण के लिए, किसी पुराने मित्र का नाम इस समय हमारे मन में नहीं चल रहा है। लेकिन कोई व्यक्ति उसका उल्लेख करता है तो उसका चेहरा और नाम तुरंत स्मरण हो जाता है। वह जानकारी उस क्षण चेतना में सक्रिय नहीं थी, फिर भी स्मृति से वापस आ गई।
इसके विपरीत, अचेतन शब्द का प्रयोग उन मानसिक प्रक्रियाओं या प्रभावों के लिए किया जाता है जिनकी क्रिया हमारे व्यवहार पर पड़ सकती है, लेकिन जिनका प्रत्यक्ष ज्ञान हमें नहीं होता अथवा जिन्हें सामान्य प्रयास से चेतना में लाना आसान नहीं होता।
उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति के प्रति हमारे मन में एक अस्पष्ट भय या असहजता उत्पन्न होती है। हम उसका स्पष्ट कारण नहीं बता पाते, फिर भी हमारा व्यवहार उससे प्रभावित होता है।
यहाँ एक सावधानी आवश्यक है। प्रत्येक अस्पष्ट भावना के पीछे कोई छिपी हुई दबी स्मृति ही हो, ऐसा मानना उचित नहीं है। उसके पीछे वर्तमान परिस्थिति, पूर्व अनुभव, सीखा हुआ व्यवहार, शारीरिक अवस्था या कोई अन्य कारण भी हो सकता है।
चेतन, अवचेतन और अचेतन का व्यावहारिक अन्तर
इन तीनों को समझने का एक सरल तरीका यह है कि हम देखें कि किसी मानसिक सामग्री तक हमारी पहुँच कितनी है।
चेतन मन में वे विचार, भावनाएँ और अनुभव आते हैं जिनका ज्ञान हमें वर्तमान क्षण में है। जैसे अभी इस लेख को पढ़ना, किसी वाक्य का अर्थ समझना अथवा किसी प्रश्न पर विचार करना।
अवचेतन के सामान्य अर्थ में वे स्मृतियाँ और जानकारियाँ आ सकती हैं जो इस समय हमारे ध्यान में नहीं हैं, लेकिन संकेत मिलने पर याद आ सकती हैं। जैसे अपने विद्यालय का नाम, किसी पुराने परिचित का चेहरा अथवा बचपन में सीखा हुआ कोई गीत।
अचेतन मानसिक प्रक्रियाओं के अन्तर्गत ऐसी अनेक क्रियाएँ रखी जा सकती हैं जो हमारी जागरूक इच्छा के बिना चलती हैं। जैसे किसी परिचित रास्ते पर चलते हुए स्वतः सही मोड़ लेना, पढ़ते समय शब्दों को पहचानना अथवा किसी परिस्थिति में बिना सोचे तत्काल प्रतिक्रिया देना।
यह विभाजन समझने की सुविधा के लिए है। आधुनिक मनोविज्ञान में मन को तीन निश्चित कमरों में बँटा हुआ नहीं माना जाता। मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन अलग-अलग क्षमताओं, स्मृतियों, प्रतिक्रियाओं और सूचनाओं के प्रसंस्करण के आधार पर किया जाता है।
मनोविज्ञान में अवचेतन और अचेतन की अवधारणा
मनोविज्ञान के कुछ सिद्धान्तों में चेतन, पूर्वचेतन और अचेतन के बीच अन्तर किया गया है।
इस विभाजन में पूर्वचेतन उस मानसिक सामग्री को कहा जाता है जो वर्तमान में चेतना का हिस्सा नहीं है, लेकिन उचित संकेत या प्रयास से चेतना में आ सकती है।
अचेतन को कुछ मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों में ऐसी मानसिक सामग्री और प्रक्रियाओं से जोड़ा गया है जो सीधे चेतना में उपलब्ध नहीं होतीं। इनमें दबी हुई इच्छाओं, संघर्षों और अनुभवों की भूमिका की चर्चा भी की गई है।
यह एक विशिष्ट सैद्धान्तिक दृष्टिकोण है। आधुनिक वैज्ञानिक मनोविज्ञान में इन सभी प्रक्रियाओं को एक ही अचेतन क्षेत्र में समेटने के बजाय अलग-अलग अवधारणाओं के माध्यम से समझा जाता है।
उदाहरण के लिए—
अप्रत्यक्ष स्मृति: ऐसी सीखी हुई जानकारी जिसका उपयोग हम कर लेते हैं, लेकिन सीखने की प्रक्रिया या उससे जुड़ी जानकारी को स्पष्ट रूप से याद नहीं कर पाते।
स्वचालित प्रक्रिया: ऐसी मानसिक क्रिया जो बार-बार अभ्यास के कारण बिना अधिक सचेत प्रयास के होने लगती है।
प्राइमिंग: पहले मिले किसी संकेत का बाद में हमारी प्रतिक्रिया या विचार पर प्रभाव पड़ना, जबकि हमें उस प्रभाव का स्पष्ट ज्ञान न हो।
अचेतन प्रत्यक्षण: कुछ परिस्थितियों में किसी संकेत या सूचना का प्रसंस्करण होना, जबकि व्यक्ति उसे स्पष्ट रूप से अनुभव करने की रिपोर्ट न कर सके।
इन अवधारणाओं से पता चलता है कि चेतना के बाहर भी मानसिक प्रक्रियाएँ सक्रिय रह सकती हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मन के भीतर कोई एक रहस्यमय सत्ता बैठी हुई है जो हमारे सभी निर्णयों को नियंत्रित करती है।
भूल जाना, दब जाना और याद न आना — तीन अलग स्थितियाँ
अवचेतन और अचेतन के विषय में एक बड़ा भ्रम स्मृति को लेकर उत्पन्न होता है। लोग अक्सर मान लेते हैं कि जो बात याद नहीं है, वह अचेतन में दबकर बैठी है।
वास्तव में स्मृति से जुड़ी कई अलग-अलग स्थितियाँ होती हैं।
कभी हम किसी बात को ठीक से सीख ही नहीं पाते। इसलिए बाद में उसे याद नहीं कर पाते। कभी जानकारी सीखी होती है, लेकिन समय के साथ उसका स्मरण कमजोर हो जाता है। कभी जानकारी स्मृति में उपलब्ध होती है, पर उस क्षण उसे वापस प्राप्त करना कठिन होता है। और कभी कोई अनुभव ऐसा प्रभाव छोड़ता है जिसका हमारे वर्तमान व्यवहार पर असर पड़ता है, भले ही हमें उस अनुभव का स्पष्ट स्मरण न हो।
इन स्थितियों को एक ही नाम देना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है।
विशेष रूप से किसी पुरानी घटना का स्मरण न होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि वह घटना अचेतन में दबा दी गई है। स्मृति की प्रकृति जटिल है। उसमें विस्मरण, पुनर्निर्माण, संकेतों की भूमिका और समय के साथ परिवर्तन जैसी प्रक्रियाएँ काम करती हैं।
इसलिए अपने मन को समझने के लिए अनुमान के स्थान पर सावधानीपूर्वक निरीक्षण आवश्यक है।
आदतें और स्वचालित व्यवहार
अवचेतन तथा अचेतन की चर्चा में आदतों का विशेष महत्त्व है।
मनुष्य जब किसी काम को बार-बार करता है तो धीरे-धीरे उस काम के लिए सचेत प्रयास की आवश्यकता कम हो सकती है। प्रारम्भ में साइकिल चलाना सीखते समय व्यक्ति को संतुलन, गति, दिशा और ब्रेक पर अलग-अलग ध्यान देना पड़ता है। अभ्यास के बाद यही क्रियाएँ अपेक्षाकृत सहज हो जाती हैं।
इसी प्रकार मोबाइल उठाना, बार-बार किसी सूचना को देखना, क्रोध में तेज आवाज में बोलना अथवा तनाव में भोजन करना भी अभ्यास से विकसित व्यवहार हो सकते हैं।
इनमें से कुछ आदतें उपयोगी होती हैं, जबकि कुछ हमारे लिए हानिकारक बन जाती हैं।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात समझनी चाहिए। आदत का स्वचालित हो जाना यह नहीं बताता कि उसे बदला नहीं जा सकता। अभ्यास से बनी आदतों को नए अभ्यास, वातावरण में परिवर्तन और सचेत प्रयास के माध्यम से बदला जा सकता है।
अर्थात् मनुष्य अपने प्रत्येक स्वचालित व्यवहार को तत्काल नियंत्रित न कर पाए, फिर भी वह धीरे-धीरे उसके निर्माण और परिवर्तन में भाग ले सकता है।
भारतीय दर्शन में संस्कार, वासना और चित्तवृत्ति
भारतीय दर्शन में मनुष्य के व्यवहार को समझने के लिए संस्कार, वासना और चित्तवृत्ति जैसे शब्दों का प्रयोग मिलता है।
योगदर्शन में संस्कारों को चित्त पर पड़ने वाले प्रभावों के रूप में समझा जाता है। किसी अनुभव, विचार या क्रिया के बार-बार दोहराए जाने से मन में एक प्रवृत्ति विकसित हो सकती है। आगे चलकर वही प्रवृत्ति व्यवहार को प्रभावित करती है।
योगसूत्र में पतञ्जलि कहते हैं—
इस सूत्र में संस्कारों के साक्षात्कार और पूर्वजन्म के ज्ञान के बीच सम्बन्ध बताया गया है। यह योगदर्शन की अपनी दार्शनिक और साधनात्मक मान्यता है। इसे आधुनिक मनोविज्ञान द्वारा प्रमाणित स्मृति-सिद्धान्त के समान नहीं मानना चाहिए।
इसी प्रकार वासना का सम्बन्ध मनुष्य की गहरी प्रवृत्तियों और इच्छाओं से जोड़ा जाता है। चित्तवृत्ति मन की विभिन्न गतिविधियों और परिवर्तनों को व्यक्त करती है।
इन अवधारणाओं की आधुनिक मनोविज्ञान की आदत, अप्रत्यक्ष स्मृति और स्वचालित मानसिक प्रक्रिया से कुछ तुलनात्मक समानताएँ दिखाई दे सकती हैं, लेकिन दोनों की परिभाषा, उद्देश्य और दार्शनिक आधार अलग हैं।
भारतीय दर्शन का महत्त्व इस बात में है कि वह मनुष्य को केवल बाहरी व्यवहार तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसके भीतर चलने वाली प्रवृत्तियों, संस्कारों और मानसिक परिवर्तनों को समझने का प्रयास करता है।
अवचेतन मन के बारे में प्रचलित भ्रम
आज अवचेतन मन के नाम पर अनेक दावे किए जाते हैं। इनमें कुछ बातें उपयोगी मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों से प्रेरित हैं, लेकिन कुछ दावों के पक्ष में पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
पहला भ्रम यह है कि मनुष्य अपने मस्तिष्क या मन का केवल दस प्रतिशत उपयोग करता है और शेष नब्बे प्रतिशत अवचेतन है। यह लोकप्रिय धारणा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है।
दूसरा भ्रम यह है कि अवचेतन मन को एक ही वाक्य या संकल्प से तत्काल बदला जा सकता है। सकारात्मक कथन उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन स्थायी व्यवहार परिवर्तन के लिए अभ्यास, वातावरण, प्रेरणा और निरन्तरता की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण होती है।
तीसरा भ्रम यह है कि प्रत्येक बीमारी का कारण अवचेतन मन में छिपा हुआ कोई नकारात्मक विचार है। मानसिक तनाव का शरीर पर प्रभाव पड़ सकता है, लेकिन सभी बीमारियों को मानसिक विश्वासों का परिणाम मानना गलत है। शारीरिक रोगों के अनेक जैविक, आनुवंशिक, पर्यावरणीय और अन्य कारण होते हैं।
चौथा भ्रम यह है कि सम्मोहन या ध्यान के माध्यम से मनुष्य अपनी प्रत्येक भूली हुई स्मृति को सही-सही वापस प्राप्त कर सकता है। स्मृति पुनर्निर्माण की प्रक्रिया है और सुझावों के प्रभाव से गलत या बदली हुई स्मृतियाँ भी उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए ऐसी विधियों को सावधानी से समझना चाहिए।
अचेतन मन पर शोध का उद्देश्य चमत्कार खोजने के बजाय मानसिक प्रक्रियाओं को अधिक स्पष्टता से समझना होना चाहिए।
अवचेतन और अचेतन को समझने का व्यावहारिक तरीका
यदि मनुष्य अपने भीतर चलने वाली प्रक्रियाओं को समझना चाहता है तो उसे अपने दैनिक जीवन का निरीक्षण करना चाहिए।
जब कोई प्रतिक्रिया स्वतः उत्पन्न होती है, तब स्वयं से पूछना उपयोगी हो सकता है कि उस समय परिस्थिति क्या थी, मेरे मन में कौन-सा विचार आया, शरीर में कैसी अनुभूति हुई और मैंने कैसी प्रतिक्रिया दी।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति की आलोचना सुनते ही क्रोध उत्पन्न होता है, तो केवल क्रोध को दबाने के बजाय यह देखना चाहिए कि आलोचना में ऐसा क्या था जिसने उसे प्रभावित किया। क्या उसमें अपमान का अनुभव था? क्या अपनी योग्यता पर संदेह उत्पन्न हुआ? क्या पहले भी ऐसी परिस्थितियों में यही प्रतिक्रिया हुई है?
इस प्रकार के निरीक्षण से धीरे-धीरे अपने व्यवहार के दोहराए जाने वाले ढाँचे पहचाने जा सकते हैं।
इसके लिए कुछ सरल अभ्यास उपयोगी हो सकते हैं—
दैनिक आत्मनिरीक्षण: दिन में हुई किसी एक तीव्र प्रतिक्रिया को लिखें और उसके पहले की परिस्थिति को समझने का प्रयास करें।
आदतों का निरीक्षण: देखें कि कौन-सा काम आप बिना सोचे बार-बार करते हैं। उसके समय, परिस्थिति और परिणाम को दर्ज करें।
स्मृति का निरीक्षण: जब कोई पुरानी घटना याद आती है, तब देखें कि किस संकेत ने उस स्मृति को सक्रिय किया।
ध्यान का अभ्यास: कुछ समय शान्त बैठकर विचारों, भावनाओं और शारीरिक संवेदनाओं को बिना तुरन्त प्रतिक्रिया दिए देखने का अभ्यास करें।
यदि किसी व्यक्ति को पुराने अनुभवों से जुड़ा गहरा मानसिक कष्ट, लगातार भय या दैनिक जीवन में बाधा उत्पन्न करने वाली समस्या हो तो प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सहायता लेना उचित है। आत्मनिरीक्षण उपयोगी है, लेकिन यह हर स्थिति में पेशेवर उपचार का विकल्प नहीं है।
अचेतन मन को वश में करने की दिशा में इसका महत्त्व
अब तक हमने मन, चेतना और अचेतन मन के स्वरूप को समझने का प्रयास किया है। इस अध्याय में अवचेतन और अचेतन के बीच अन्तर स्पष्ट करने से एक महत्त्वपूर्ण बात सामने आती है—हमारे भीतर होने वाली प्रत्येक मानसिक क्रिया एक जैसी नहीं होती।
कुछ जानकारियाँ थोड़े प्रयास से चेतना में आ जाती हैं। कुछ व्यवहार अभ्यास से स्वचालित हो जाते हैं। कुछ मानसिक प्रभावों का स्रोत हमें स्पष्ट नहीं होता। और कुछ प्रक्रियाओं को समझने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन तथा मनोवैज्ञानिक सहायता की आवश्यकता होती है।
इसलिए अचेतन मन को वश में करने का पहला अर्थ उसे दबाना नहीं, बल्कि उसके प्रभावों को पहचानना है।
जिस व्यवहार को हम पहचान नहीं पाते, उसमें परिवर्तन करना कठिन होता है। लेकिन जब हम अपनी आदतों, प्रतिक्रियाओं और मानसिक प्रवृत्तियों को देखने लगते हैं, तब परिवर्तन की सम्भावना पैदा होती है।
मनुष्य का उद्देश्य अपने मन की प्रत्येक प्रक्रिया को चेतन नियंत्रण में लाना नहीं हो सकता। ऐसा करना न सम्भव है और न आवश्यक। वास्तविक उद्देश्य यह है कि जो प्रक्रियाएँ हमारे जीवन को अनावश्यक रूप से प्रभावित कर रही हैं, उन्हें समझकर उनके साथ अधिक सजग और संतुलित व्यवहार विकसित किया जाए।
अध्याय का निष्कर्ष
अवचेतन और अचेतन शब्दों का प्रयोग कई बार एक-दूसरे के स्थान पर किया जाता है, लेकिन उनके पीछे अलग-अलग मानसिक प्रक्रियाओं और सैद्धान्तिक धारणाओं का संकेत हो सकता है। आधुनिक मनोविज्ञान में इन प्रक्रियाओं को स्मृति, स्वचालित व्यवहार, अप्रत्यक्ष अधिगम और अचेतन सूचना-प्रसंस्करण जैसी विशिष्ट अवधारणाओं से समझा जाता है।
भारतीय दर्शन में संस्कार, वासना और चित्तवृत्ति के माध्यम से मन की गहरी प्रवृत्तियों का विश्लेषण मिलता है। दोनों दृष्टियों का तुलनात्मक अध्ययन उपयोगी है, लेकिन उन्हें एक ही सिद्धान्त मान लेना उचित नहीं।
अचेतन मन को समझने की दिशा में अगला आवश्यक विषय है—स्मृति। क्योंकि मनुष्य का वर्तमान व्यवहार केवल वर्तमान परिस्थिति से नहीं बनता; उसमें पूर्व अनुभवों और उनसे निर्मित मानसिक प्रभावों की भी भूमिका होती है।
अगला अध्याय — अध्याय–५ : स्मृति — अनुभवों का संचय, संरक्षण और पुनःप्राप्ति
इस अध्याय में हम समझेंगे कि स्मृति कैसे बनती है, कैसे सुरक्षित रहती है, क्यों भूल जाती है और किस प्रकार पुराने अनुभव हमारे वर्तमान विचारों तथा व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
(इस ब्लॉग के लेखों के किसी भी अंश या पूरे लेख का उपयोग करने के पहले लेखक की अनुमति अनिवार्य है।)
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