ध्याय–५ : स्मृति — अनुभवों का संचय, संरक्षण और पुनःप्राप्ति
अचेतन मन को वश में कैसे करें -प्रथम खण्ड — अचेतन मन का स्वरूप -अध्याय–५ : स्मृति — अनुभवों का संचय, संरक्षण और पुनःप्राप्ति
मनुष्य का वर्तमान केवल वर्तमान क्षण से निर्मित नहीं होता। उसके विचारों, भावनाओं, निर्णयों और व्यवहार में अतीत के अनुभवों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। हम किसी व्यक्ति से मिलते हैं तो उसके प्रति हमारी प्रतिक्रिया में पहले के अनुभव शामिल हो सकते हैं। कोई गीत सुनते ही बचपन की स्मृति जाग सकती है। किसी विशेष गंध से कोई पुरानी घटना याद आ सकती है। कभी-कभी हम किसी परिस्थिति में वैसी ही प्रतिक्रिया देते हैं जैसी वर्षों पहले दिया करते थे, जबकि हमें यह भी ध्यान नहीं रहता कि यह व्यवहार कहाँ से आया।
इन सभी अनुभवों के पीछे स्मृति की भूमिका होती है।
स्मृति केवल बीती हुई घटनाओं को याद रखने की क्षमता नहीं है। यह वह मानसिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हम अनुभवों से सीखते हैं, ज्ञान को सुरक्षित रखते हैं, वर्तमान परिस्थितियों को समझते हैं और भविष्य के व्यवहार की तैयारी करते हैं।
अचेतन मन को समझने के लिए स्मृति का अध्ययन इसलिए आवश्यक है, क्योंकि हमारे अनेक व्यवहार उन अनुभवों से प्रभावित होते हैं जिन्हें हम हर समय सचेत रूप से याद नहीं कर रहे होते।
स्मृति क्या है?
स्मृति वह मानसिक क्षमता है जिसके माध्यम से मस्तिष्क अनुभवों और सूचनाओं को ग्रहण करता है, उनका कुछ रूप में संरक्षण करता है और आवश्यकता पड़ने पर उनका पुनः उपयोग करता है।
यदि मनुष्य के पास स्मृति न हो तो वह प्रत्येक दिन जीवन को लगभग शून्य से आरम्भ करेगा। वह भाषा सीखकर भूल जाएगा, अपने अनुभवों से लाभ नहीं उठा पाएगा और अपने जीवन की निरन्तरता को भी ठीक से अनुभव नहीं कर सकेगा।
बचपन में सीखा हुआ चलना, बोलना, पढ़ना, लिखना और सामाजिक व्यवहार करना स्मृति तथा अधिगम की प्रक्रियाओं के कारण सम्भव होता है।
स्मृति के कारण ही हम पहचान पाते हैं कि कौन हमारा परिचित है, कौन-सा रास्ता हमें घर पहुँचाता है और किस अनुभव से हमें सावधान रहना चाहिए।
इस प्रकार स्मृति केवल अतीत का संग्रह नहीं, बल्कि वर्तमान जीवन को व्यवस्थित करने वाली एक सक्रिय मानसिक प्रक्रिया है।
स्मृति कैसे बनती है?
किसी अनुभव के स्मृति में बदलने की प्रक्रिया को समझने के लिए तीन प्रमुख चरणों पर ध्यान देना आवश्यक है।
पहला चरण — कूटबद्धीकरण
जब हम किसी घटना, दृश्य, शब्द या अनुभव को ग्रहण करते हैं, तब मस्तिष्क उस सूचना को अपने ढंग से संसाधित करता है। इस प्रक्रिया को कूटबद्धीकरण कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, जब कोई विद्यार्थी किसी विषय को पढ़ता है तो केवल शब्दों को देखना पर्याप्त नहीं होता। वह उनके अर्थ को समझता है, पुराने ज्ञान से जोड़ता है और मानसिक रूप से उनकी संरचना बनाता है। इससे उस जानकारी के स्मृति में सुरक्षित होने की सम्भावना बढ़ती है।
दूसरा चरण — संरक्षण
अनुभव से प्राप्त सूचना कुछ समय तक या लम्बी अवधि तक स्मृति में बनी रह सकती है। यह संरक्षण कई प्रकार का हो सकता है।
कुछ सूचनाएँ केवल कुछ क्षणों के लिए रहती हैं। कुछ जानकारी कई दिनों या वर्षों तक सुरक्षित रह सकती है। कुछ कौशल इतने गहरे अभ्यास से विकसित हो जाते हैं कि लम्बे समय तक बने रहते हैं।
तीसरा चरण — पुनःप्राप्ति
जब हमें किसी पुराने अनुभव या जानकारी की आवश्यकता होती है तो हम उसे स्मृति से वापस प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
जैसे किसी परिचित का नाम याद करना, परीक्षा में पढ़ा हुआ उत्तर लिखना या किसी पुराने स्थान का रास्ता बताना।
कभी स्मृति तुरंत वापस आ जाती है, कभी प्रयास करना पड़ता है और कभी जानकारी उपलब्ध होने के बावजूद हम उसे याद नहीं कर पाते।
इन तीनों चरणों में कोई कठिनाई उत्पन्न होने पर भूलने या स्मरण में बाधा आने का अनुभव हो सकता है।
स्मृति के प्रमुख प्रकार
मनोविज्ञान में स्मृति को समझने के लिए कई प्रकार के वर्गीकरण किए गए हैं। इनमें एक उपयोगी विभाजन अल्पकालिक स्मृति, कार्यशील स्मृति और दीर्घकालिक स्मृति का है।
अल्पकालिक स्मृति
यह ऐसी स्मृति है जिसमें जानकारी थोड़े समय तक बनी रहती है। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति हमें एक फोन नम्बर बताता है। हम उसे कुछ क्षण तक याद रखते हैं और फिर लिख लेते हैं।
यदि उस जानकारी को दोहराया न जाए या किसी प्रकार से सुरक्षित न किया जाए तो वह शीघ्र भूल सकती है।
कार्यशील स्मृति
कार्यशील स्मृति केवल जानकारी को कुछ समय तक रखने का काम नहीं करती, बल्कि उस पर मानसिक कार्य भी करती है।
उदाहरण के लिए, किसी गणितीय प्रश्न को हल करते समय हमें कुछ संख्याएँ याद रखनी होती हैं, उनके बीच सम्बन्ध समझना होता है और परिणाम तक पहुँचने के लिए उनका उपयोग करना होता है।
इसी प्रकार किसी व्यक्ति की बात सुनते हुए उसके पहले वाक्य को ध्यान में रखकर दूसरे वाक्य का अर्थ समझना भी कार्यशील स्मृति का उदाहरण है।
दीर्घकालिक स्मृति
दीर्घकालिक स्मृति में वे अनुभव और जानकारियाँ आती हैं जो लम्बे समय तक सुरक्षित रह सकती हैं।
हमारी भाषा, बचपन की अनेक घटनाएँ, सीखा हुआ ज्ञान, परिचित व्यक्तियों की पहचान और जीवन में अर्जित कौशल इसके उदाहरण हैं।
दीर्घकालिक स्मृति की क्षमता और उसका स्वरूप बहुत व्यापक है। इसमें केवल घटनाओं का विवरण ही नहीं, बल्कि कौशल, अर्थ और विभिन्न प्रकार का ज्ञान भी शामिल होता है।
अनुभवों की स्मृति और ज्ञान की स्मृति
दीर्घकालिक स्मृति को समझने का एक दूसरा तरीका है—घटनात्मक और अर्थगत स्मृति के बीच अन्तर करना।
घटनात्मक स्मृति में हमारे व्यक्तिगत अनुभव आते हैं। जैसे बचपन में विद्यालय का पहला दिन, किसी प्रिय व्यक्ति से पहली मुलाकात अथवा किसी यात्रा का अनुभव।
अर्थगत स्मृति में सामान्य ज्ञान, शब्दों के अर्थ, तथ्यों और अवधारणाओं से सम्बन्धित जानकारी आती है।
उदाहरण के लिए, हमें यह पता होना कि प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम की धार्मिक मान्यता है, अर्थगत ज्ञान है। लेकिन स्वयं संगम पर जाकर किसी विशेष दिन का अनुभव करना घटनात्मक स्मृति का हिस्सा है।
इन दोनों प्रकार की स्मृतियों का जीवन में अलग-अलग उपयोग होता है। अर्थगत स्मृति हमें संसार को समझने में सहायता करती है, जबकि घटनात्मक स्मृति हमारे व्यक्तिगत जीवन की निरन्तरता और पहचान से जुड़ी होती है।
स्मृति और भावना का सम्बन्ध
मनुष्य सभी घटनाओं को एक समान रूप से याद नहीं रखता। कुछ घटनाएँ बहुत स्पष्ट रूप से याद रहती हैं, जबकि कुछ सामान्य घटनाएँ जल्दी भूल जाती हैं।
इसमें भावना की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो सकती है।
जिस घटना से गहरा सुख, दुःख, भय, आश्चर्य या प्रेम जुड़ा हो, वह कभी-कभी स्मृति में अधिक प्रभाव छोड़ती है। किसी प्रिय व्यक्ति से जुड़ी छोटी-सी घटना वर्षों तक याद रह सकती है, जबकि उसी दिन की अनेक सामान्य बातें भूल जाती हैं।
ऐसा इसलिए होता है कि भावनात्मक अनुभव ध्यान, स्मृति निर्माण और बाद में स्मरण की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भावनात्मक घटना की स्मृति हमेशा पूरी तरह सही होगी। तीव्र भावना के साथ जुड़ी स्मृति भी समय के साथ बदल सकती है। हम किसी घटना के कुछ अंश याद रख सकते हैं, कुछ भूल सकते हैं और कभी-कभी बाद में सुनी हुई बातों को भी अपनी स्मृति का हिस्सा समझ सकते हैं।
इसलिए स्मृति की स्पष्टता और उसकी ऐतिहासिक शुद्धता दो अलग बातें हैं।
क्या स्मृति हमेशा सत्य होती है?
यह प्रश्न अचेतन मन के अध्ययन में बहुत महत्त्वपूर्ण है।
सामान्यतः हम मानते हैं कि जो घटना हमें याद है, वह ठीक वैसी ही हुई होगी। लेकिन मनोविज्ञान के अध्ययन से पता चलता है कि स्मृति किसी वीडियो रिकॉर्डिंग की तरह काम नहीं करती।
हम जब किसी घटना को याद करते हैं तो उसका पुनर्निर्माण भी करते हैं। उसमें हमारे वर्तमान विचार, बाद में प्राप्त जानकारी, भावनाएँ और विश्वास शामिल हो सकते हैं।
उदाहरण के लिए, बचपन की किसी घटना को याद करते समय हो सकता है कि हमें उसका एक दृश्य याद हो, लेकिन उसके बारे में परिवार के सदस्यों से सुनी गई बातें भी हमारी स्मृति में मिल गई हों।
इसी प्रकार दो व्यक्ति एक ही घटना को अलग-अलग ढंग से याद कर सकते हैं। दोनों के अनुभव वास्तविक हो सकते हैं, लेकिन उनके स्मरण में अन्तर हो सकता है।
इससे स्पष्ट होता है कि स्मृति महत्त्वपूर्ण है, लेकिन उसे बिना जाँच के पूर्ण सत्य मान लेना उचित नहीं।
स्मृति और अचेतन मन
अब हम इस अध्याय के सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर आते हैं—स्मृति का अचेतन मन से क्या सम्बन्ध है?
हमारे जीवन में अनेक ऐसे कौशल और व्यवहार हैं जिनमें स्मृति काम करती है, लेकिन हमें हर बार उसका सचेत अनुभव नहीं होता।
उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति वर्षों से साइकिल चला रहा है। उसे प्रत्येक बार यह सोचने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि पैडल कैसे चलाना है, संतुलन कैसे बनाए रखना है और मोड़ पर शरीर को किस प्रकार झुकाना है।
यहाँ सीखे हुए कौशल और अभ्यास से विकसित प्रक्रियाएँ स्वतः काम कर रही होती हैं।
इसी प्रकार किसी परिचित भाषा को पढ़ते समय हम प्रत्येक अक्षर का अर्थ अलग-अलग सोचकर नहीं समझते। शब्दों की पहचान और भाषा की समझ बहुत हद तक स्वचालित हो चुकी होती है।
मनोविज्ञान में ऐसे अनेक प्रभावों को अप्रत्यक्ष स्मृति और प्रक्रियात्मक स्मृति जैसी अवधारणाओं से समझा जाता है।
प्रक्रियात्मक स्मृति का सम्बन्ध सीखे हुए कौशल और क्रियाओं से है। जैसे तैरना, साइकिल चलाना, वाद्य बजाना या किसी मशीन को चलाना।
अप्रत्यक्ष स्मृति उस स्थिति को समझने में उपयोगी है जिसमें पूर्व अनुभव वर्तमान व्यवहार को प्रभावित करता है, भले ही व्यक्ति उस अनुभव को स्पष्ट रूप से याद न कर रहा हो।
इससे एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है—हमारे व्यवहार पर केवल वे स्मृतियाँ प्रभाव नहीं डालतीं जिन्हें हम सचेत रूप से याद कर रहे होते हैं। कुछ सीखे हुए प्रभाव हमारी जागरूकता के बाहर भी सक्रिय रह सकते हैं।
स्मृति से आदत और संस्कार का निर्माण
जब कोई अनुभव बार-बार दोहराया जाता है तो उससे व्यवहार की एक स्थायी प्रवृत्ति विकसित हो सकती है।
मान लीजिए, कोई व्यक्ति तनाव होने पर बार-बार मोबाइल देखने लगता है। प्रारम्भ में वह जानबूझकर ऐसा करता है। धीरे-धीरे तनाव और मोबाइल देखने के बीच सम्बन्ध बन जाता है। आगे चलकर तनाव उत्पन्न होते ही उसका हाथ स्वतः मोबाइल की ओर बढ़ सकता है।
यहाँ अनुभव, पुनरावृत्ति और व्यवहार के बीच सम्बन्ध विकसित हुआ है।
इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति कठिन परिस्थिति में धैर्यपूर्वक विचार करने का अभ्यास करता है तो समय के साथ उसकी प्रतिक्रिया में धैर्य बढ़ सकता है।
भारतीय दर्शन में ऐसे ही स्थायी मानसिक प्रभावों और प्रवृत्तियों को समझाने के लिए संस्कार की अवधारणा मिलती है।
संस्कार का अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। योग और भारतीय दार्शनिक परम्पराओं में इसका सम्बन्ध अनुभवों से निर्मित मानसिक प्रभावों और प्रवृत्तियों से भी है।
इस दृष्टि से बार-बार किए गए कर्म, विचार और प्रतिक्रियाएँ मनुष्य के व्यवहार में गहरी छाप छोड़ सकती हैं।
हालाँकि संस्कार को आधुनिक मनोविज्ञान की स्मृति या आदत के बिल्कुल समान मानना उचित नहीं होगा। दोनों की अपनी अलग अवधारणात्मक पृष्ठभूमि है।
स्मृति को बेहतर बनाने के उपाय
यदि स्मृति हमारे ज्ञान, अनुभव और व्यवहार को प्रभावित करती है तो उसे व्यवस्थित और विकसित करना भी आवश्यक है।
इसके लिए केवल अधिक पढ़ना पर्याप्त नहीं है। सीखने और याद रखने की प्रक्रिया को सही ढंग से अपनाना भी महत्त्वपूर्ण है।
ध्यानपूर्वक सीखना: किसी विषय को पढ़ते समय उसका अर्थ समझने का प्रयास करें। बिना समझे बार-बार पढ़ना हमेशा प्रभावी नहीं होता।
दोहराव: सीखी हुई जानकारी को अलग-अलग समय पर दोहराना स्मृति को मजबूत करने में सहायक हो सकता है।
सक्रिय स्मरण: पुस्तक बन्द करके स्वयं से प्रश्न पूछें कि आपने क्या सीखा। उत्तर को स्मृति से निकालने का प्रयास करना सीखने की प्रक्रिया को मजबूत करता है।
सम्बन्ध स्थापित करना: नई जानकारी को पहले से ज्ञात विषयों से जोड़ें। इससे जानकारी को समझना और याद रखना सरल हो सकता है।
पर्याप्त नींद: नींद स्मृति के स्थिरीकरण और सीखने की प्रक्रियाओं में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
लेखन और आत्मनिरीक्षण: दिन के अनुभवों को लिखना केवल घटनाओं को सुरक्षित रखना नहीं है, बल्कि अपने विचारों और प्रतिक्रियाओं को समझने का माध्यम भी बन सकता है।
क्या स्मृति को बदला जा सकता है?
स्मृति के अध्ययन में यह एक गम्भीर प्रश्न है।
हम सामान्यतः मानते हैं कि पुरानी स्मृति जैसी बन गई, वैसी ही बनी रहेगी। लेकिन स्मृति स्थिर वस्तु नहीं है। जब हम किसी अनुभव को याद करते हैं तो कुछ परिस्थितियों में वह स्मृति पुनः सक्रिय होकर नए प्रभावों के प्रति संवेदनशील हो सकती है। इसके बाद वह फिर से स्थिर हो सकती है।
मनोविज्ञान और तंत्रिका-विज्ञान में इस प्रक्रिया को स्मृति का पुनर्स्थिरीकरण कहा जाता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि हम अपनी इच्छा से किसी भी पुरानी स्मृति को मिटा सकते हैं या मनचाहा रूप दे सकते हैं। लेकिन यह समझना उपयोगी है कि किसी पुराने अनुभव के प्रति हमारा वर्तमान दृष्टिकोण बदल सकता है।
उदाहरण के लिए, बचपन में किसी विषय में असफल होने के कारण किसी व्यक्ति के मन में यह धारणा बन गई कि वह उस विषय को कभी नहीं सीख सकता। बाद में यदि वह धैर्यपूर्वक उसी विषय का अध्ययन करता है और सफलता प्राप्त करता है तो उसका पुराना आत्मविश्वास सम्बन्धी विश्वास बदल सकता है।
घटना नहीं बदली, लेकिन उस घटना से निर्मित अर्थ और वर्तमान व्यवहार बदल सकते हैं।
यही वह क्षेत्र है जहाँ स्मृति का अध्ययन अचेतन मन को समझने और मानसिक संतुलन विकसित करने में सहायता करता है।
स्मृति पर नियंत्रण का वास्तविक अर्थ
स्मृति पर नियंत्रण का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य अपनी प्रत्येक पुरानी घटना को याद रख सके या अप्रिय अनुभवों को इच्छानुसार मिटा दे।
इसका व्यावहारिक अर्थ है—
अपने अनुभवों को समझना।
पुराने अनुभवों से बने अनुचित निष्कर्षों की पहचान करना।
उपयोगी ज्ञान और कौशल को मजबूत करना।
बार-बार दोहराए जाने वाले नकारात्मक व्यवहार को बदलने का अभ्यास करना।
वर्तमान निर्णयों को केवल अतीत की प्रतिक्रियाओं के अधीन न रहने देना।
यदि किसी पुराने अनुभव के कारण लगातार मानसिक पीड़ा उत्पन्न हो रही हो तो उसे केवल इच्छाशक्ति से दबाने के बजाय उपयुक्त मनोवैज्ञानिक सहायता लेना अधिक उपयोगी हो सकता है।
मनुष्य अपने अतीत को बदल नहीं सकता, लेकिन अतीत को समझने और उससे सम्बन्धित वर्तमान प्रतिक्रिया को बदलने का प्रयास कर सकता है।
अध्याय का निष्कर्ष
स्मृति मनुष्य के मानसिक जीवन का आधार है। इसके माध्यम से अनुभव ज्ञान में बदलते हैं, ज्ञान व्यवहार को प्रभावित करता है और बार-बार दोहराए गए व्यवहार से आदतें तथा मानसिक प्रवृत्तियाँ विकसित होती हैं।
स्मृति हमेशा सचेत रूप में सक्रिय नहीं रहती। कुछ सीखे हुए कौशल और अनुभव हमारे व्यवहार को उस समय भी प्रभावित कर सकते हैं जब हम उन्हें स्पष्ट रूप से याद नहीं कर रहे होते।
अतः अचेतन मन को समझने के लिए स्मृति का अध्ययन अनिवार्य है। अपने अतीत को समझना, स्मृतियों के प्रभाव को पहचानना और वर्तमान व्यवहार को सजगता से बदलना आत्मनियन्त्रण की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम हैं।
अगला अध्याय — अध्याय–६ : ध्यान — मन की ऊर्जा और चयन की प्रक्रिया
इस अध्याय में हम समझेंगे कि ध्यान क्या है, मन किसी एक विषय पर कैसे केन्द्रित होता है, ध्यान क्यों भटकता है और अभ्यास के माध्यम से उसे अधिक स्थिर कैसे बनाया जा सकता है।
मुकेश श्रीवास्तव
आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र
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