अचेतन मन का स्वरूप - अध्याय–६ : ध्यान — मन की ऊर्जा और चयन की प्रक्रिया
अचेतन मन को वश में कैसे करें - प्रथम खण्ड — अचेतन मन का स्वरूप - अध्याय–६ : ध्यान — मन की ऊर्जा और चयन की प्रक्रिया
मनुष्य का मन एक क्षण में अनेक दिशाओं में जा सकता है। वह किसी एक विषय पर विचार कर रहा होता है, तभी कोई पुरानी स्मृति सामने आ जाती है। किसी काम को करते समय अचानक कोई दूसरी बात याद आने लगती है। कभी शरीर एक स्थान पर होता है, लेकिन मन कहीं और भटक रहा होता है।
हम सभी इस अनुभव से परिचित हैं कि किसी पुस्तक को पढ़ते-पढ़ते आँखें तो शब्दों पर चलती रहती हैं, लेकिन मन किसी दूसरी घटना में उलझा रहता है। कुछ समय बाद पता चलता है कि हमने कई पृष्ठ पढ़ लिए, परन्तु समझ में कुछ भी नहीं आया।
ऐसी स्थिति में समस्या केवल स्मृति की नहीं होती। समस्या ध्यान की होती है।
ध्यान वह मानसिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हम अनेक उपलब्ध सूचनाओं में से किसी एक या कुछ सूचनाओं को प्राथमिकता देते हैं और उन पर अपनी मानसिक क्षमता केन्द्रित करते हैं।
अचेतन मन को समझने के लिए ध्यान का अध्ययन इसलिए आवश्यक है, क्योंकि हम जिस बात पर ध्यान देते हैं, वही हमारे अनुभव, स्मृति और व्यवहार को विशेष रूप से प्रभावित कर सकती है।
ध्यान क्या है?
सामान्य भाषा में ध्यान का अर्थ किसी एक विषय पर मन लगाना माना जाता है। लेकिन मनोविज्ञान की दृष्टि से ध्यान इससे अधिक व्यापक प्रक्रिया है।
हमारे आसपास हर समय अनेक प्रकार की सूचनाएँ उपस्थित रहती हैं। आँखों से दृश्य, कानों से ध्वनियाँ, त्वचा से स्पर्श, नाक से गन्ध और शरीर के भीतर से अनेक संवेदनाएँ प्राप्त होती रहती हैं। इसके अतिरिक्त स्मृतियाँ, कल्पनाएँ, इच्छाएँ और विचार भी मन में सक्रिय रहते हैं।
यदि मन इन सभी सूचनाओं को समान रूप से ग्रहण करने लगे तो किसी एक काम को व्यवस्थित रूप से करना कठिन हो जाएगा।
ध्यान इस भीड़ में चयन करने का काम करता है।
उदाहरण के लिए, किसी शोरगुल वाले कमरे में बैठकर भी हम अपनी बातचीत पर ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं। आसपास की दूसरी आवाजें पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं, लेकिन वे हमारी चेतना में कम महत्त्व प्राप्त करती हैं।
इस प्रकार ध्यान का एक प्रमुख कार्य है—महत्त्वपूर्ण सूचना को प्राथमिकता देना और अनावश्यक व्यवधानों को सीमित करना।
ध्यान और चेतना का सम्बन्ध
ध्यान और चेतना एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं, लेकिन दोनों समान नहीं हैं।
चेतना का सम्बन्ध अनुभव करने और जानने की क्षमता से है, जबकि ध्यान का सम्बन्ध किसी विशेष अनुभव या सूचना को प्राथमिकता देने से है।
उदाहरण के लिए, आप किसी कमरे में बैठे हैं। कमरे का तापमान, आसपास की आवाजें और शरीर की स्थिति आपके अनुभव का हिस्सा हो सकती हैं। लेकिन यदि आप किसी व्यक्ति की बात ध्यान से सुन रहे हैं तो आपका ध्यान मुख्यतः उसकी आवाज और शब्दों पर केन्द्रित है।
इससे स्पष्ट होता है कि चेतना में उपस्थित प्रत्येक अनुभव पर समान मात्रा में ध्यान नहीं दिया जाता।
कभी ध्यान किसी बाहरी वस्तु पर होता है और कभी भीतर चल रहे विचारों या भावनाओं पर।
जब हम अपने ही विचारों को देखते हैं, अपनी प्रतिक्रिया को पहचानते हैं और यह समझते हैं कि हमारा मन किस दिशा में जा रहा है, तब ध्यान आत्मनिरीक्षण का माध्यम बन जाता है।
ध्यान के प्रमुख प्रकार
ध्यान को समझने के लिए उसकी कुछ प्रमुख कार्यप्रणालियों पर विचार करना उपयोगी है।
चयनात्मक ध्यान
जब हम अनेक उपलब्ध सूचनाओं में से किसी एक पर ध्यान केन्द्रित करते हैं तो इसे चयनात्मक ध्यान कहा जाता है।
जैसे भीड़ में अपने परिचित व्यक्ति की आवाज पहचानना या शोर के बीच किसी विशेष बातचीत को सुनना।
सतत ध्यान
किसी कार्य पर एक निश्चित अवधि तक ध्यान बनाए रखना सतत ध्यान कहलाता है।
जैसे विद्यार्थी का लम्बे समय तक पढ़ाई करना, चालक का सड़क पर लगातार ध्यान रखना अथवा किसी शोधकर्ता का किसी विषय पर गहराई से काम करना।
विभाजित ध्यान
जब हम एक से अधिक कार्यों पर एक साथ ध्यान देने का प्रयास करते हैं तो इसे विभाजित ध्यान कहा जाता है।
जैसे खाना बनाते हुए किसी से बातचीत करना। हालांकि मनुष्य वास्तव में कई कठिन कार्यों को एक ही समय में समान दक्षता से नहीं कर पाता। अक्सर मस्तिष्क तेजी से एक कार्य से दूसरे कार्य पर ध्यान बदलता रहता है।
वैकल्पिक ध्यान
जब हम आवश्यकता के अनुसार एक कार्य से दूसरे कार्य पर ध्यान स्थानान्तरित करते हैं तो इसे वैकल्पिक ध्यान कहा जाता है।
जैसे कोई व्यक्ति पुस्तक पढ़ते समय फोन की घंटी सुनकर बातचीत करने लगता है और फिर वापस पुस्तक पढ़ने लगता है।
इन प्रकारों को समझने से पता चलता है कि ध्यान केवल एकाग्रता नहीं है। इसमें चयन, स्थिरता और आवश्यकता के अनुसार परिवर्तन भी शामिल हैं।
ध्यान क्यों भटकता है?
मनुष्य अक्सर शिकायत करता है कि उसका मन एक जगह नहीं टिकता। वह पढ़ना चाहता है, लेकिन विचार दूसरी दिशा में चले जाते हैं। वह ध्यान करना चाहता है, लेकिन पुराने अनुभव याद आने लगते हैं।
ध्यान भटकने के अनेक कारण हो सकते हैं।
कभी बाहरी वातावरण ध्यान को प्रभावित करता है। शोर, मोबाइल की सूचनाएँ, लोगों का आना-जाना और आसपास की गतिविधियाँ ध्यान को तोड़ सकती हैं।
कभी आन्तरिक कारण अधिक प्रभावशाली होते हैं। चिन्ता, भय, क्रोध, उत्सुकता, अधूरी इच्छाएँ और पुरानी स्मृतियाँ मन को बार-बार अपनी ओर खींच सकती हैं।
कभी शरीर की स्थिति भी ध्यान को प्रभावित करती है। नींद की कमी, थकान, भूख, अस्वस्थता और मानसिक तनाव के कारण ध्यान बनाए रखना कठिन हो सकता है।
इसलिए ध्यान भटकने को केवल इच्छाशक्ति की कमजोरी मानना उचित नहीं है।
ध्यान की क्षमता पर वातावरण, शरीर, भावना, रुचि और अभ्यास—सभी का प्रभाव पड़ता है।
ध्यान और अचेतन मन
अब प्रश्न उठता है कि ध्यान का अचेतन मन से क्या सम्बन्ध है?
हमारे मन में अनेक प्रक्रियाएँ ऐसी होती हैं जो हमारी इच्छा के बिना भी ध्यान को अपनी ओर खींचती हैं।
उदाहरण के लिए, यदि हम किसी काम में व्यस्त हैं और अचानक तेज आवाज सुनाई देती है तो हमारा ध्यान स्वतः उस ओर चला जाता है। किसी खतरे का संकेत मिलने पर भी ध्यान तेजी से उसी दिशा में केन्द्रित हो सकता है।
इसी प्रकार कोई पुरानी स्मृति, भावनात्मक अनुभव या अधूरी चिन्ता बार-बार हमारे विचारों में लौट सकती है।
इसका अर्थ है कि ध्यान केवल हमारी सचेत इच्छा से संचालित नहीं होता। उसमें स्वचालित मानसिक प्रक्रियाओं की भी भूमिका होती है।
कभी हम जानबूझकर किसी विषय पर ध्यान देते हैं और कभी कोई विषय स्वयं हमारा ध्यान खींच लेता है।
यही कारण है कि अचेतन मन को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि हमारा ध्यान किन परिस्थितियों में स्वतः बदल जाता है।
ध्यान और स्मृति का सम्बन्ध
ध्यान तथा स्मृति का सम्बन्ध अत्यन्त निकट है।
किसी अनुभव को स्मृति में सुरक्षित रखने के लिए सामान्यतः उस पर पर्याप्त ध्यान देना उपयोगी होता है। जिस जानकारी पर हमारा ध्यान ही नहीं गया, उसे बाद में स्पष्ट रूप से याद करना कठिन हो सकता है।
उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति अपना परिचय देता है और हम उसी समय किसी दूसरी बात में व्यस्त हैं तो सम्भव है कि उसका नाम हमें याद न रहे।
इसके विपरीत, यदि हम उसका नाम ध्यानपूर्वक सुनते हैं और उसे उसके चेहरे या किसी अन्य जानकारी से जोड़ते हैं तो स्मरण की सम्भावना बढ़ जाती है।
ध्यान सीखने की प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है। विद्यार्थी यदि पढ़ते समय बार-बार मोबाइल देखता है तो उसकी समझ और स्मरण दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
इसलिए ध्यान को स्मृति निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण सहायक माना जा सकता है।
लेकिन यह भी समझना चाहिए कि केवल ध्यान देने से प्रत्येक जानकारी स्थायी स्मृति में सुरक्षित नहीं हो जाती। समझ, अभ्यास, दोहराव और नींद जैसी प्रक्रियाएँ भी महत्त्वपूर्ण हैं।
ध्यान और भावनाएँ
भावनाएँ हमारे ध्यान को प्रभावित करती हैं।
जिस विषय से हमें भय होता है, उस पर हमारा ध्यान बार-बार जा सकता है। जिस व्यक्ति से प्रेम होता है, उससे जुड़ी छोटी-छोटी बातें भी हमें विशेष रूप से दिखाई दे सकती हैं। जिस बात से क्रोध उत्पन्न हुआ हो, उसी घटना को मन बार-बार दोहरा सकता है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को किसी बैठक में अपमानित अनुभव हुआ है तो वह घर लौटने के बाद भी उसी घटना के बारे में सोचता रह सकता है। उसका ध्यान बार-बार उसी संवाद पर लौटता है।
कभी-कभी यह चिन्तन समस्या को समझने में सहायता करता है, लेकिन जब वही विचार बार-बार बिना किसी समाधान के लौटते रहते हैं तो मानसिक थकान बढ़ सकती है।
इसलिए ध्यान को केवल किसी विषय पर केन्द्रित करना ही पर्याप्त नहीं है। यह समझना भी आवश्यक है कि भावनाएँ हमारे ध्यान को किस दिशा में ले जा रही हैं।
भारतीय दर्शन में ध्यान की अवधारणा
भारतीय दर्शन और योग परम्परा में ध्यान को मन के प्रशिक्षण का महत्त्वपूर्ण साधन माना गया है।
पतञ्जलि के योगसूत्र में अष्टांगयोग के अन्तर्गत प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का क्रम मिलता है।
धारणा का अर्थ है चित्त को किसी निश्चित देश या विषय में बाँधना।
पतञ्जलि का सूत्र है— “देशबन्धश्चित्तस्य धारणा॥” — योगसूत्र ३.१ - अर्थात् चित्त को किसी निश्चित स्थान या विषय में स्थिर करना धारणा है।
इसके बाद ध्यान की परिभाषा दी गई है— “तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्॥” — योगसूत्र ३.२ - अर्थात् उसी विषय में ज्ञान-वृत्ति का निरन्तर प्रवाह ध्यान कहलाता है।
इन सूत्रों से स्पष्ट होता है कि योगदर्शन में ध्यान केवल आँखें बन्द करके बैठने का नाम नहीं है। यह चित्त को एक विषय में स्थिर और निरन्तर बनाए रखने की साधना है।
भगवद्गीता में भी मन की चंचलता और उसके अभ्यास के विषय में अर्जुन का प्रश्न आता है।
अर्जुन कहते हैं— “चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।” — भगवद्गीता ६.३४ - अर्थात् मन चंचल, मथ डालने वाला, बलवान और दृढ़ है।
इसके उत्तर में श्रीकृष्ण कहते हैं— “अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥” - — भगवद्गीता ६.३५ अर्थात् अभ्यास और वैराग्य के द्वारा मन को वश में किया जा सकता है।
यहाँ अभ्यास का अर्थ केवल एक बार ध्यान लगाने का प्रयास नहीं है, बल्कि बार-बार मन को निर्धारित दिशा में लौटाने का निरन्तर प्रयास है।
वैराग्य का अर्थ यह है कि मन प्रत्येक आकर्षण, इच्छा या विचार के पीछे अनिवार्य रूप से न भागे।
इस प्रकार भारतीय योग परम्परा ध्यान को मानसिक अनुशासन और आत्मनिरीक्षण का साधन मानती है।
ध्यान और बौद्ध दर्शन
बौद्ध परम्परा में भी ध्यान और सजगता का विशेष महत्त्व है।
स्मृत्युपस्थान की साधना में शरीर, वेदना, चित्त और धर्म का निरीक्षण किया जाता है।
यहाँ स्मृति का अर्थ केवल पुरानी घटनाओं को याद करना नहीं, बल्कि वर्तमान अनुभव के प्रति जागरूक बने रहना भी है।
उदाहरण के लिए, जब क्रोध उत्पन्न हो तो व्यक्ति केवल क्रोध में बहने के बजाय यह देख सकता है कि क्रोध उत्पन्न हो रहा है। जब श्वास चल रही हो तो वह श्वास के आने-जाने का निरीक्षण कर सकता है।
इस प्रकार साधक अपने अनुभव और उसके प्रति अपनी प्रतिक्रिया के बीच एक सजग स्थान विकसित करने का अभ्यास करता है।
यह अभ्यास अचेतन प्रतिक्रिया को पहचानने में सहायक हो सकता है। प्रतिक्रिया उत्पन्न होने और उसके अनुसार व्यवहार करने के बीच जागरूकता विकसित होने लगे तो व्यक्ति के पास अपने व्यवहार को चुनने की अधिक सम्भावना होती है।
ध्यान को विकसित करने के व्यावहारिक उपाय
ध्यान की क्षमता केवल सिद्धान्त पढ़ने से विकसित नहीं होती। इसके लिए नियमित अभ्यास आवश्यक है।
एक समय में एक कार्य करें
जब कोई महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हों तो अनावश्यक रूप से कई कार्य एक साथ करने से बचें। पढ़ते समय केवल पढ़ने, लिखते समय केवल लिखने और बातचीत करते समय सामने वाले की बात सुनने का अभ्यास करें।
ध्यान का छोटा अभ्यास करें
प्रतिदिन कुछ समय शान्त बैठकर श्वास के आने-जाने पर ध्यान दें। श्वास को बदलने का प्रयास न करें। केवल उसके स्वाभाविक प्रवाह को देखें।
जब मन दूसरी दिशा में चला जाए तो स्वयं को दोष न दें। धीरे से ध्यान वापस श्वास पर ले आएँ।
विचारों को पहचानें
यदि ध्यान के समय कोई विचार बार-बार आता है तो उससे संघर्ष करने के बजाय यह देखें कि वह किस विषय से सम्बन्धित है। क्या वह किसी चिन्ता से जुड़ा है, किसी अधूरे काम से या किसी पुरानी घटना से?
ध्यान भटकाने वाले वातावरण को कम करें
काम के समय मोबाइल की अनावश्यक सूचनाएँ बन्द रखें। पढ़ने या लिखने के लिए अपेक्षाकृत शान्त स्थान चुनें।
नियमितता बनाए रखें
एक दिन बहुत देर तक ध्यान करने की अपेक्षा प्रतिदिन थोड़े समय का नियमित अभ्यास अधिक उपयोगी हो सकता है।
शरीर का ध्यान रखें
पर्याप्त नींद, उचित भोजन और शारीरिक गतिविधि ध्यान की क्षमता को बनाए रखने में सहायता करते हैं।
आत्मनिरीक्षण : ध्यान को समझने का अभ्यास
ध्यान को विकसित करने के साथ-साथ यह जानना भी आवश्यक है कि हमारा ध्यान सामान्यतः कहाँ जाता है।
इसके लिए एक सरल अभ्यास किया जा सकता है।
दिन में किसी एक समय पाँच मिनट बैठकर यह देखें कि पिछले कुछ समय में आपका मन किन विषयों की ओर गया।
क्या वह किसी अधूरे काम के बारे में सोच रहा था? क्या वह किसी व्यक्ति से हुई बातचीत को दोहरा रहा था? क्या वह भविष्य की चिन्ता में उलझा था? क्या वह किसी सुखद स्मृति में खोया था?
इन विचारों को अच्छा या बुरा घोषित करने की आवश्यकता नहीं है। केवल यह देखना है कि मन की सामान्य दिशा क्या है।
कुछ दिनों तक ऐसा करने पर व्यक्ति अपने ध्यान के दोहराए जाने वाले ढाँचे पहचान सकता है।
उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति का ध्यान बार-बार भविष्य की चिन्ताओं की ओर जाता है। किसी दूसरे व्यक्ति का ध्यान पुरानी असफलताओं पर अटका रहता है। कोई व्यक्ति छोटी-छोटी बाहरी आवाजों से विचलित हो जाता है।
इन प्रवृत्तियों को पहचानना ही उनमें परिवर्तन की शुरुआत है।
क्या ध्यान के माध्यम से अचेतन मन को नियंत्रित किया जा सकता है?
ध्यान अचेतन मन की प्रत्येक प्रक्रिया को सीधे नियंत्रित नहीं कर सकता। शरीर की अनेक जैविक क्रियाएँ, स्वतः चलने वाली मानसिक प्रक्रियाएँ और अनेक स्वचालित प्रतिक्रियाएँ हमारी प्रत्यक्ष इच्छा से बाहर रहती हैं।
लेकिन ध्यान के अभ्यास से हम अपनी मानसिक गतिविधियों को अधिक स्पष्ट रूप से पहचान सकते हैं।
जब व्यक्ति यह जानने लगता है कि उसका मन किस विषय की ओर जा रहा है, कौन-सी भावना उसका ध्यान खींच रही है और कौन-सी आदत उसे बार-बार एक ही व्यवहार करने के लिए प्रेरित कर रही है, तब वह अपने व्यवहार में परिवर्तन के अवसर पहचान सकता है।
इसलिए ध्यान को अचेतन मन पर किसी जादुई अधिकार की तरह नहीं, बल्कि आत्मनियन्त्रण विकसित करने के एक महत्त्वपूर्ण साधन की तरह समझना चाहिए।
ध्यान का वास्तविक लाभ यह है कि वह मनुष्य को अपनी मानसिक प्रक्रियाओं का दर्शक बनने और आवश्यकता पड़ने पर अपने व्यवहार का चयन करने की क्षमता विकसित करने में सहायता करता है।
अध्याय का निष्कर्ष
ध्यान मन की वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हम उपलब्ध सूचनाओं में से कुछ को प्राथमिकता देते हैं। यह चेतना, स्मृति, भावना और व्यवहार से गहराई से जुड़ा हुआ है।
ध्यान कभी हमारी इच्छा से किसी विषय पर केन्द्रित होता है और कभी बाहरी संकेतों, भावनाओं तथा पुरानी मानसिक प्रवृत्तियों के कारण स्वतः बदल जाता है।
योगदर्शन में धारणा और ध्यान को चित्त के प्रशिक्षण की क्रमिक अवस्थाओं के रूप में समझाया गया है। भगवद्गीता अभ्यास और वैराग्य के माध्यम से मन को साधने की बात करती है। बौद्ध परम्परा वर्तमान अनुभव के प्रति सजग रहने का अभ्यास सिखाती है।
इन सभी दृष्टियों से एक बात सामने आती है—मन को साधने का आरम्भ उसे बलपूर्वक रोकने से नहीं, बल्कि उसकी गति को समझने से होता है।
अगला अध्याय — अध्याय–७ : स्वचालित मानसिक प्रक्रियाएँ — आदतें, प्रतिक्रियाएँ और संस्कार
इस अध्याय में हम समझेंगे कि मनुष्य अनेक काम बिना सोचे कैसे करता है, आदतें किस प्रकार बनती हैं, प्रतिक्रियाएँ स्वतः क्यों उत्पन्न होती हैं और क्या अभ्यास के माध्यम से इन स्वचालित प्रक्रियाओं को बदला जा सकता है।
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