महुए की गंध में बसा इश्क़
धीरे-धीरे उतरता है साँसों में,
जैसे जंगल ने
किसी राज़ को
फूलों की शक्ल में खोल दिया हो।
वो स्त्री
जब प्रेम करती है,
तो शब्दों से नहीं
मिट्टी की सोंधी चुप्पी से करती है।
उसके बालों में
वन की हवा उलझी रहती है,
और हथेलियों में
दिन भर की मेहनत की तपिश।
रात को
जब ढोल की थाप दूर कहीं गूँजती है,
उसकी आँखों में
चाँद की परछाई नहीं,
आग की लौ झिलमिलाती है।
वो महुए के फूल
सिर्फ़ बटोरती नहीं
उनमें अपने सपने चुनती है,
और जिस दिन
किसी के हाथ में
अपना चुना हुआ फूल रख दे,
समझो
वो अपना दिल दे चुकी।
उसका इश्क़
शहरों की तरह सजावटी नहीं,
न ही वादों से भरा
वो बस साथ चलने का
सीधा-सा यक़ीन है।
महुए की गंध
सुबह तक भी रहती है,
और उसका प्रेम
बरसों तक
धीमा, गहरा,
और मिट्टी से जुड़ा हुआ।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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