साल वन की बेटी का प्रण

साल वन की बेटी का प्रण

हवा में नहीं बिखरता,

वो जड़ों में उतरता है

और धरती की नब्ज़ में बस जाता है।


उसकी देह पर

धूप का रंग है,

आँखों में

नदी की अडिग चमक।


वो जब कहती है “साथ”,

तो उसका अर्थ

मौसम भर का नहीं होता 

वो बरसों की पगडंडी है,

जिस पर काँटे भी हों

तो कदम नहीं लौटते।


उसकी हँसी

वनपाखी की पुकार है,

और उसका क्रोध

अचानक उठती आँधी।


वो प्रेम को

चाँदी की थाली में नहीं सजाती,

वो उसे

साल के पेड़-सा रोप देती है 

धीरे-धीरे बढ़ता,

मगर एक दिन

आकाश छू लेता है।


उसका प्रण

नदी की धारा-सा है 

रोक दो,


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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