मिट्टी, ढोल और दिल की थाप

 

मिट्टी, ढोल और दिल की थाप —
यही उसका गीत है,
यही उसका इज़हार।

वो जब खेत की मेड़ों पर चलती है,
तो पाँव से उठती धूल
मानो उसके प्रेम का संदेश हो।

उसकी हथेलियों में
बीजों की गर्माहट है,
और आँखों में
दूर तक फैले आकाश का भरोसा।

रात ढले
जब ढोल की थाप गूँजती है,
उसका दिल भी
उसी लय में धड़कता है —
धीमा नहीं,
संकोच से परे।

वो प्रेम को
शब्दों में नहीं तौलती,
न कसमों में बाँधती है —
बस नृत्य की गोलाई में
किसी के साथ कदम मिला दे,
तो वही उसका स्वीकार है।

मिट्टी की सोंधी गंध
उसके आँचल में बसती है,
और ढोल की थाप
उसकी छाती में।

उसका प्रेम
नदी के मोड़-सा सहज है —
बिना घोषणा,
बिना प्रदर्शन,
सिर्फ़ साथ की धड़कन।

और जो उस थाप को सुन ले,
वो जान जाए —
उसने दिल का दरवाज़ा
धीरे से खोल दिया है।

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