झरनों के बीच पनपा प्रेम

 झरनों के बीच पनपा प्रेम

शोर में भी अपना गीत पहचान लेता है,

पत्थरों से टकराकर भी

मीठी धुन में ढल जाता है।


वो स्त्री

जिसकी हँसी

पानी की फुहार-सी हल्की है,

जब प्रेम करती है

तो पूरे वन को

अपने साथ बहा ले जाती है।


उसकी पायल

किसी बाज़ार की नहीं,

भीगे कंकड़ों की खनक है 

नंगे पाँव चलती हुई

धरती से बातें करती है।


झरने के पास

वो अक्सर चुप बैठती है,

और पानी की लहरों में

अपना अक्स नहीं,

किसी का नाम ढूँढती है।


उसका इकरार

लंबे ख़तों में नहीं आता,

बस एक दिन

वो कंधे से कंधा मिलाकर

पत्थरों पर उतर जाएगी 

फिसलन से बेख़ौफ़।


क्योंकि उसका प्रेम

बहते पानी-सा है 

रोकने से नहीं रुकता,

और जो साथ चल पड़े,

उसे अपने संग

दूर तक ले जाता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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