जंगल की देहरी पर रखा दिल
जैसे किसी ने
धरती की चौखट पर
अपनी धड़कन उतार दी हो।
सामने साल और सखुआ के ऊँचे तन,
उनकी छाल पर समय की झुर्रियाँ,
बीच-बीच में महुए की गंध
हवा में घुलती हुई
मीठी, हल्की, मदहोश।
पगडंडी काई से भीगी,
जहाँ हर क़दम
नरम मिट्टी में हल्का-सा निशान छोड़ता है।
झाड़ियों के पीछे
जंगली जामुन की बैंगनी चमक,
और कहीं दूर
एक झरना
पत्थरों से टकराकर
अपना राग साधता हुआ।
सुबह
धूप पत्तों के जाल से छनकर
सोने के सिक्कों-सी बिखरती है,
शाम को
धुआँ उठता है कुटियों से
और आकाश
अँगारों-सा सुर्ख हो जाता है।
इसी देहरी पर
उसने अपना दिल रखा
न किसी दावे के साथ,
न किसी भय के साथ।
उसका प्रेम
जंगल की तरह है
ऊपर से अनगढ़,
भीतर से व्यवस्थित।
जहाँ हर बेल
किसी तने का सहारा लेती है,
और हर पेड़
अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है।
अगर तुम उस देहरी पर आओ,
तो कदम हल्के रखना
यहाँ पत्तों की सरसराहट भी
वचन मानी जाती है,
और दिल
एक बार रख दिया जाए
तो वापस नहीं उठाया जाता।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,
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