बाँसों की छाँव में लिया गया वचन
हवा की सरसराहट पर नहीं टिका,
वो धरती की भीतरी नमी में
धीरे-धीरे जम गया।
उसने शब्द कम कहे,
पर उसकी आँखों में
सूरज डूबते वक़्त की
लालिमा ठहरी रही
गहरी और सच्ची।
पास ही
सूखे पत्तों पर गिरती रोशनी
टूटे हुए सोने-सी बिखर रही थी,
और दूर कहीं
कोयल की आवाज़
संध्या का दीप जला रही थी।
उसने
कलाई से उतारकर
लाल धागे का छोटा-सा टुकड़ा
उसके हाथ में रख दिया
बस इतना ही था उसका प्रण।
न साक्षी कोई शिला,
न कोई लिखित शपथ
सिर्फ़
दो धड़कनों के बीच
ठहरा हुआ भरोसा।
बाँसों की लचक
उसे याद दिलाती रही —
झुकना हार नहीं होता,
साथ बने रहना ही
सच्चा साहस है।
और उस दिन से
हर हवा का झोंका
उन्हीं बाँसों से टकराकर
एक ही बात दोहराता है
कुछ वचन
आवाज़ से नहीं,
आभा से निभाए जाते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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