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Saturday, 28 February 2026

नदी की मटकी में भरा समय

 नदी की मटकी में भरा समय


हमने एक दिन

नदी से कहा

ज़रा ठहरो,

तुम्हारी बहती हुई उम्र

हथेलियों से फिसल जाती है।


नदी मुस्कुराई,

और अपनी लहरों में से

एक मटकी गढ़ दी

मिट्टी की,

जिसमें धड़कन की गूँज थी।


हमने उसमें

थोड़ा-सा समय भर लिया,

जैसे कोई

बरसात का पानी सहेजता है

आने वाली प्यास के लिए।


उस मटकी में

बचपन की किलकारियाँ थीं,

युवावस्था की अधीरता,

और बुज़ुर्ग दिनों की

धीमी, लंबी साँसें।


जब भी

जीवन बहुत तेज़ भागने लगता,

हम मटकी का ढक्कन खोलते

और भीतर से

नदी की ठंडी आवाज़ निकलती,

कहती

“सब कुछ बह रहा है,

पर सब कुछ मिटता नहीं।”


धूप उसे छूती

तो समय चमक उठता,

रात उसे सहलाती

तो उसमें तारों की परछाईं उतर आती।


एक दिन

मटकी ज़रा-सी चटक गई

और समय की कुछ बूँदें

फर्श पर गिर पड़ीं।


हम घबराए नहीं।

हमने देखा

वहीं से

नई कोंपल फूट आई थी।


तब समझ आया

नदी की मटकी में भरा समय

रखा नहीं जाता,

वह सींचा जाता है।


और जो सींचा जाए,

वह कभी समाप्त नहीं होता—

बस रूप बदलकर

फिर बहने लगता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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