सब फूल झुके हुए
मैं तन्हाई में खड़ा हूँ,
जहाँ आवाज़ें मुझ तक नहीं पहुँचतीं।
हर खामोशी, हर खालीपन की परत
मेरी आत्मा को धीरे-धीरे खोलती है।
मैं चलता हूँ
भले ही कदम केवल वहीं ठहरते हों,
जहाँ उम्मीद की रौशनी झिलमिलाती है,
और अतीत की छाया मुझसे टकराती है।
सत्य कोई चीज़ नहीं,
केवल अनुभव का रूप है,
केवल उस दर्द और प्रेम का प्रतिबिंब है
जिसे मैं स्वयं में रखता हूँ।
हर फूल, हर घूँट हवा का,
मुझसे पूछता है
“क्या तुमने अपने भीतर के भूखे हिस्सों को भी देखा?”
मैं झुकता हूँ,
सिर्फ बाहरी दुनिया के लिए नहीं,
बल्कि अपने भीतर की उन अनकही कहानियों के लिए,
जो केवल मेरी आत्मा जानती है।
और तभी,
झुकते हुए, मैं खड़ा हूँ
एक ही समय में टूटकर और सशक्त होकर।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,
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