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Friday, 27 February 2026

मैं और इलाहाबाद / प्रयागराज

 मैं और इलाहाबाद / प्रयागराज


मुझमें और इलाहाबाद में

कई समानताएँ हैं, कई विषमताएँ

मगर अब उसे पुकारता हूँ

तो ज़ुबान पर “प्रयागराज” उतर आता है,

जैसे इतिहास ने

अपना असली नाम फिर से पहन लिया हो।


वो पहले भी संगम था,

आज भी संगम है—

बस समय की धारा

अपना वेश बदलती रही।


मैं सोचता हूँ—

इस शहर की रगों में

सनातन का ज्ञान

वैसा ही बहता है

जैसे भोर की आरती में उठता धुआँ।


घंटियों की टंकार में

वेदों की परछाइयाँ हैं,

घाटों की सीढ़ियों पर

ऋषियों के पदचिह्न अब भी गर्म हैं।


प्रयागराज कहना

सिर्फ़ नाम बदलना नहीं,

जैसे स्मृति का द्वार खुलना हो—

जहाँ हर कण में

एक आदिम श्लोक गूँजता है।


मेरे भीतर भी

कुछ वैसा ही सनातन अंश है—

जो तर्क से परे,

समय से परे

चुपचाप ज्योति-सा जलता रहता है।


मगर कहानी यहीं पूरी नहीं होती।


इस मिट्टी ने

मध्यकाल की नवाबी आहट भी सुनी है।

अवध की नफ़ासत,

लहजे की मिठास,

अदब की तहज़ीब—

वो सब हवा में घुला है।


किसी पुरानी हवेली की खिड़की से

अब भी उर्दू का कोई मिसरा

धीरे से झाँक लेता है।


मैं जब बोलता हूँ,

तो मेरे शब्दों में

कभी संस्कृत की गंभीरता होती है,

कभी नवाबी लचक—

जैसे यह शहर

मेरी ज़ुबान में घर कर गया हो।


और फिर

वर्तमान का वैभव—


चौड़ी सड़कों पर दौड़ती रौशनी,

नए पुल,

नई इमारतें,

बढ़ती रफ़्तार का ऐलान।


सिविल लाइंस अब भी सलीके से सजा है,

मगर उसके साथ-साथ

एक आधुनिक चमक भी चलती है—

काँच की दीवारों में

भविष्य का चेहरा झलकता है।


मैं देखता हूँ—

प्रयागराज अब सिर्फ़ याद नहीं,

एक आकांक्षा भी है।


मैं और ये शहर—

दोनों समय के कई रंग ओढ़े हुए।


मेरे भीतर भी

एक ऋषि बैठा है,

एक फ़क्कड़ शायर,

और एक बेचैन आधुनिक मनुष्य।


प्रयागराज में भी

सनातन का ऐश्वर्य है,

अवध की नवाबी की नज़ाकत,

और आज का उदीयमान वैभव।


हम दोनों

इतिहास और वर्तमान के बीच

अपनी-अपनी बहस में मशग़ूल हैं।


कभी गुमटियों पर चाय के साथ

धर्म और राजनीति पर जिरह,

कभी घाट पर बैठ

मौन में डूबा आत्मचिंतन।


अब जब मैं कहता हूँ—

“मैं प्रयागराज का हूँ,”

तो उसमें इलाहाबाद की याद भी शामिल रहती है।


नाम बदला है,

रूह नहीं।


मैं भी बदलता रहा हूँ,

मगर भीतर का संगम

आज भी वैसा ही है—


तीन धाराएँ—

ज्ञान, तहज़ीब और स्वप्न—

एक साथ बहती हुईं।


मैं और प्रयागराज—

दो नहीं,

एक ही कथा के दो उच्चारण हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

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