परदे की सिलवटों में रात
परदे की सिलवटों में
रात धीरे-धीरे उतर आई है,
जैसे कोई बात
अभी कही न गई हो।
चाँदनी
कपड़े की लकीरों में
रुक-रुक कर चलती है,
और कमरा
अपनी साँसें
हल्की कर लेता है।
बाहर
शहर जाग रहा होगा,
मगर यहाँ
हर आवाज़
मौन में घुल गई है।
परदे हिलते हैं,
तो लगता है
रात कुछ कहना चाहती है
फिर
ख़ामोश हो जाती है।
मैं
उसी ख़ामोशी में
थोड़ी देर
ठहर जाता हूँ,
जैसे
परदे की सिलवटों में
सिर्फ़ रात नहीं,
मेरा भी
कोई अधूरा ख़याल
छुपा हो।
मुकेश ,,,,
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