रात नदी देर तक मुझसे बतियाती रही
रात नदी
देर तक मुझसे बतियाती रही
उसकी आवाज़ में
गीली रेत की नरमी थी,
और बहते पानी की
आहिस्ता-सी रवानी।
मैं किनारे बैठा था,
अपने ही ख़यालों की गठरी खोले,
और वो
हर लहर के साथ
मेरा नाम दोहराती रही।
कहती थी—
“तुम भी मेरी तरह हो,
ऊपर से ख़ामोश,
भीतर से मुसलसल सफ़र में।”
मैंने पूछा—
“तेरी थकान कहाँ जाती है?”
वो हँसी—
जैसे चाँदनी पानी पर टूट कर बिखर जाए—
“मैं थमती नहीं,
बस बहने को ही अपना सुकून मानती हूँ।”
रात गहराती गई,
सितारे उसकी सतह पर
छोटे-छोटे दीयों-से काँपते रहे।
उसने अपनी ठंडी लहर
मेरे पाँवों को छूकर कहा—
“जो बात किसी से न कह सको,
मुझमें बहा दो।
मैं राज़ रखने में
समंदर से कम नहीं।”
मैं देर तक सुनता रहा,
और मेरे भीतर जमी
कई बरसों की चुप्पियाँ
धीरे-धीरे पिघलती रहीं।
जब भोर की पहली लकीर
आसमान पर खिंची,
नदी ने आख़िरी बार फुसफुसाया
“रातें सिर्फ़ अँधेरा नहीं लातीं,
कभी-कभी
खुद से मुलाक़ात भी कराती हैं।”
और मैं
अपने ही बहाव में
थोड़ा-सा हल्का होकर
वापस लौट आया।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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