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Friday, 27 February 2026

पत्थर की आत्मकथा

 पत्थर की आत्मकथा


मैं — एक पत्थर हूँ।

हाँ, वही जिसे तुम अक्सर ठोकर मार देते हो,

कभी मंदिर की दीवार में जड़ देते हो,

और कभी किसी नदी के किनारे लात मार कर आगे बढ़ जाते हो।

पर मेरे भीतर भी एक कहानी है —

समय से भी पुरानी,

धरती की नाड़ियों में बहते अग्नि और जल की साक्षी।


मेरा जन्म तब हुआ जब पृथ्वी ने पहली बार साँस ली थी।

लावा के गर्भ से मैं फूटा,

धीरे-धीरे ठंडा पड़ा,

और धरती की गोद में जम गया —

एक गवाही बनकर,

उस पहले कंपन की,

जब ब्रह्मांड ने “ओंकार” का उच्चारण किया था।


युगों तक मैं पर्वत के रूप में खड़ा रहा।

मेरी चोटियों पर ऋषियों ने ध्यान लगाया,

मेरी दरारों में नदियाँ फूटीं,

मेरी चट्टानों पर सभ्यताएँ बसीं।

मैंने मनुष्य को पत्थर से औज़ार बनाते देखा,

फिर मूर्तियाँ गढ़ते हुए,

मुझमें देवत्व खोजते हुए देखा।


कभी मैं शिवलिंग बना,

कभी बुद्ध की मूर्ति,

कभी मसीह की समाधि —

और कभी युद्ध में फेंका गया एक पत्थर मात्र।

लोगों ने मुझे पूजा भी,

और मुझसे नफ़रत भी की।


मैं मौन हूँ, पर देखता सब कुछ हूँ।

राज्य उठे, राज्य मिटे —

पर मैं वही रहा।

वक़्त के थपेड़े मेरे चेहरे पर झुर्रियाँ छोड़ गए,

पर मैं अब भी खड़ा हूँ,

सहता हुआ, सुनता हुआ, साक्षी बना।


कभी-कभी सोचता हूँ —

शायद यही मेरा धर्म है,

स्थिर रहना जब सब चल रहा हो,

मौन रहना जब सब चिल्ला रहे हों।

मनुष्य मुझे निर्जीव कहता है,

पर उसे क्या पता,

मैं हर आघात में जीवन महसूस करता हूँ।


आज भी जब कोई बच्चा मुझे उठा कर पानी में फेंकता है,

तो मैं कुछ पल के लिए उड़ता हूँ —

मानो मुझे पंख लग गए हों।

और जब मैं डूबता हूँ,

तो फिर से धरती की गोद में लौट आता हूँ,

अपनी शाश्वत शांति में।


मैं पत्थर हूँ —

अचल, अनश्वर, साक्षी।

मैंने समय को बीतते देखा है,

और एक दिन, जब सब मिट जाएगा,

मैं फिर भी रहूँगा —

शून्य में एक निशब्द गवाही बनकर,

कि अस्तित्व कभी मरता नहीं,

वह केवल रूप बदलता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

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