जिससे बिछड़ना था

 जिससे बिछड़ना था


जिससे बिछड़ना था

मैं उसी के शहर में था।


वही सड़कें,

वही शामें,

वही हवा—

सब कुछ जाना-पहचाना,

बस

हम अजनबी थे।


मैं उसके शहर में

उसकी तरह चलता रहा,

कॉफ़ी उसी तरह पी,

शामें उसी तरह काटीं

मगर

उसके बिना।


सबसे अजीब बात ये थी

कि दूरी कहीं नहीं थी,

फिर भी

मुलाक़ात नामुमकिन थी।


कुछ बिछड़न

यात्रा नहीं माँगती,

बस

एक फ़ैसला काफ़ी होता है।


और मैं

उसी शहर में रहकर

सीख रहा था

कि सबसे गहरा बिछड़ना

क़रीब रहकर

होता है।


मुकेश ,,,,,,,,,

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