दीवार पर फिसलती चाँदनी

 दीवार पर फिसलती चाँदनी


दीवार पर फिसलती चाँदनी

आज कुछ कहती हुई-सी आई,

जैसे ख़ामोश लबों पर

रुकी हुई कोई दुआ उतर आई।


मैंने हथेली बढ़ाकर

उसकी ठंडी रौशनी छू ली

वो रेशम-सी लरज़ी,

फिर आहिस्ता मेरे कमरे में फैल गई।


इस उजाले में

कोई साया भी नरम पड़ जाता है,

कोई दर्द भी

अपना लहजा बदल लेता है।


चाँदनी

दीवार से सरकती हुई

मेरे दिल तक आ पहुँची,

और वहाँ

एक पुराना ख़त खोल कर बैठ गई।


मैं देर तक उसे पढ़ता रहा

हर हरफ़ में

तेरी आहट की महक थी,

हर सतर में

एक नर्म-सी तस्लीम।


जब रात और गहरी हुई,

चाँदनी ने धीरे से कहा

“मैं ठहरती नहीं,

बस याद दिलाने आती हूँ

कि उजाला हमेशा

किसी न किसी कोने में

ज़िंदा रहता है।”


और फिर

दीवार पर फिसलती हुई

वो वापस आसमान की ओर

लौट गई।


मुकेश ,,,,,,,

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है