होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Thursday, 26 February 2026

खिड़की पे टंगा चाँद

 खिड़की पे टंगा चाँद

(नज़्मों की एक श्रृंखला — एक कवि की नज़र से)

१. उदासी का चेहरा

खिड़की पे टंगा चाँद

आज कुछ बुझा-बुझा-सा है,

जैसे किसी औरत की आँखों में

रात भर का नमक उतर आया हो।


मैं उसे देखता हूँ

और सोचता हूँ

किस उदासी ने

उसकी पेशानी पर यह फीकी रौशनी रख दी?


क्या वह भी

किसी खामोश कमरे में बैठी

अपने हिस्से का आसमान

तह कर रही है?


चाँद ठहरा है,

मगर उसकी ठहरन में

एक गहरी थकान है

ठीक वैसी

जैसी एक स्त्री

अपनी मुस्कान के पीछे छुपा लेती है।


मैं लिखता हूँ

उदासी दरअसल रोती नहीं,

बस चाँद की तरह

खिड़की पर टंग जाती है।


२. इंतज़ार की रौशनी

आज वही चाँद

कुछ ज़्यादा उजला है।


मैंने गौर से देखा

उसकी किरनों में

एक बेचैन लय है,

मानो वह भी

किसी के आने की आहट पर

साँस रोके खड़ा हो।


मैं सोचता हूँ

इंतज़ार शायद

रौशनी का सबसे नाज़ुक रूप है।


वह औरत

जो दरवाज़े की कुंडी पर

उँगलियाँ फिराती रहती है,

क्या उसके दिल में भी

ऐसी ही चमक काँपती होगी?


चाँद की चुप्पी में

मैंने एक दुआ सुनी

धीमी, मगर अटल।


मैंने लिखा

इंतज़ार इश्क़ की सज़ा नहीं,

उसकी सबसे पाक तसदीक़ है।


३. यूँ ही वक़्त कटी

आज चाँद

कुछ शरारती मालूम हुआ।


खिड़की के शीशे पर

उसने अपनी गोलाई टिकाई

और जैसे कहने लगा—

चलो, आज बिना वजह बातें करें।


मैं मुस्कुराया।


सोचा

वो औरत भी तो

कभी-कभी यूँ ही

बिना मक़सद बाल सँवारती है,

बिना वजह चूड़ियाँ खनकाती है,

और वक्त को

रजाई की सिलवटों में

छुपा देती है।


चाँद की उजली उँगलियाँ

दीवार पर लकीरें खींचती रहीं,

और मैं समझ गया

यूँ ही वक़्त काटना

दरअसल जी लेने का हुनर है।


मैंने दर्ज किया

स्त्री कभी-कभी

अपने ही साये से गुफ़्तगू करती है,

और वही गुफ़्तगू

उसका सबसे सच्चा साथ होती है।


४. कवि का इक़रार


अब रात गहरी है,

और खिड़की पे टंगा चाँद

धीरे-धीरे ढल रहा है।


मैंने अपनी कलम रख दी है,

मगर सवाल अब भी बाकी है


क्या चाँद सचमुच आसमान में है,

या हर उस औरत के दिल में

जो उदासी, इंतज़ार

और यूँ ही वक़्त कटी

के दरमियान

अपनी पूरी दुनिया बसाए रहती है?


मैं जान गया हूँ

चाँद सिर्फ़ एक जिस्म नहीं,

एक एहसास है।


और हर रात

जब मैं उसे देखता हूँ,

मैं दरअसल

एक स्त्री के मन की तहों में

उतरता जाता हूँ।


खिड़की पे टंगा चाँद

मेरी नज़्म नहीं,

उसका मौन है

जिसे मैं सिर्फ़ सुनता हूँ

और लिख देता हूँ।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

No comments:

Post a Comment