सुबह का पहला, नींद से पहले का आख़िरी ख़याल सुबह

 सुबह का पहला, नींद से पहले का आख़िरी ख़याल

सुबह

जब आँख खुलती है,

तो कोई नाम

बिना पुकारे

मन में

उतर आता है

और रात

जब थककर

नींद की तरफ़

झुकती है,

तो वही नाम

आहिस्ता से

ठहर जाता है।

दिन

इन दोनों के बीच

जैसे

एक औपचारिकता है

न पूरी तरह

मेरा,

न बिल्कुल

तुम्हारा।

मैं जानता हूँ

तुम

मेरी आदत नहीं,

मेरी ज़रूरत भी नहीं—

फिर भी

मेरे वजूद की

सबसे सच्ची

सच्चाई हो।

सुबह का पहला

और नींद से पहले का

आख़िरी ख़याल

इतना काफ़ी है

एक उम्र के लिए

मोहब्बत कहलाने को

मुकेश्,,

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