सफ़्हे की नसों में बचा हुआ नाम

 सफ़्हे की नसों में बचा हुआ नाम


तुमने कहा

मैंने तुम्हें मिटा दिया है।


मैं मुस्कुराया।

क्योंकि मुझे पता था,

स्याही सिर्फ़ ऊपर से जाती है,

काग़ज़ की नसों में

वो धीरे-धीरे उतर जाती है।


तुमने हर्फ़ काटे,

लाइनें सीधी कीं,

नई कहानी लिख दी—

पर जहाँ-जहाँ मेरा नाम था,

वहाँ काग़ज़ थोड़ा-सा धड़कता रहा।


तुम्हारी उँगलियाँ

जब उस पन्ने पर ठहरती हैं,

तुम्हें कुछ महसूस होता है

एक हल्की-सी खुरदुराहट,

जैसे कोई अक्षर

अभी भी भीतर साँस ले रहा हो।


मैं अब शब्द नहीं हूँ,

न वाक्य,

न कोई पूरा अध्याय—

बस एक महीन-सी रग हूँ

जो उस सफ़्हे के जिस्म में

धीमे-धीमे चलती है।


तुम पढ़ती रहो

नई किताब,

नया नाम

पर एक दिन

अचानक किसी सन्नाटे में

जब उँगली उस जगह से गुज़रेगी,


तुम्हें लगेगा

किसी ने भीतर से

धीरे से पुकारा है।


वो मैं नहीं,

वो तुम्हारा अपना दिल होगा

जो उस सफ़्हे की नसों में

बचा हुआ मेरा नाम

फिर से पढ़ लेगा।


— मुकेश

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